मार्च से जुलाई के बीच राज्यों की सिफारिश पर 2.44 लाख से ज्यादा लिंक हटाए गए; I4C ने निवेश ठगी और महत्वपूर्ण ढांचे को निशाना बनाने वाले 51 हजार से अधिक URL पर कराई कार्रवाई

डिजिटल स्ट्राइक: 5 महीने में करीब 3 लाख खतरनाक URL ब्लॉक, साइबर ठगी के खिलाफ सरकार की बड़ी कार्रवाई

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By Roopa
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नई दिल्ली: देश में बढ़ते साइबर अपराध और ऑनलाइन धोखाधड़ी के खिलाफ केंद्र और राज्य सरकारों ने पिछले पांच महीनों में बड़े पैमाने पर कार्रवाई की है। मार्च से जुलाई 2026 के बीच करीब 3 लाख गैरकानूनी और खतरनाक URL को ब्लॉक करने की प्रक्रिया पूरी की गई। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लिंक की थी, जिनका इस्तेमाल लोगों को ऑनलाइन ठगी के जाल में फंसाने, फर्जी निवेश योजनाओं का लालच देने और अन्य साइबर अपराधों के लिए किया जा रहा था।

सरकारी कार्रवाई में राज्यों की भूमिका सबसे अहम रही। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, कुल ब्लॉक किए गए URL में करीब 82 प्रतिशत यानी लगभग 2.44 लाख लिंक राज्यों की ओर से की गई सिफारिशों के आधार पर हटाए गए। इससे साफ है कि साइबर अपराधों से निपटने में स्थानीय स्तर पर पुलिस और प्रशासन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। अलग-अलग राज्यों से मिले इनपुट के आधार पर ऐसे वेब लिंक की पहचान की गई, जो नागरिकों को आर्थिक नुकसान पहुंचाने या गैरकानूनी गतिविधियों को बढ़ावा देने में इस्तेमाल हो रहे थे।

I4C ने भी हजारों खतरनाक लिंक पर की कार्रवाई

इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने भी इस अभियान में बड़ी भूमिका निभाई। केंद्र की ओर से 51 हजार से अधिक खतरनाक URL को ब्लॉक कराने की कार्रवाई की गई। इनमें ऐसे लिंक शामिल थे, जिनके जरिए लोगों को निवेश पर असामान्य रिटर्न का लालच देकर ठगी की जा रही थी। कुछ URL महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से भी जुड़े पाए गए।

साइबर अपराध विशेषज्ञों के मुताबिक, साइबर ठगी में इस्तेमाल होने वाले URL का जीवनकाल अक्सर बहुत छोटा होता है। अपराधी एक लिंक ब्लॉक होने के बाद नए डोमेन या URL के जरिए वही गतिविधि दोबारा शुरू कर सकते हैं। इसलिए केवल URL ब्लॉक करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके पीछे मौजूद डोमेन, होस्टिंग, भुगतान व्यवस्था और डिजिटल पहचान से जुड़े नेटवर्क की जांच भी जरूरी है।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, साइबर अपराध के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई के लिए URL ब्लॉकिंग के साथ-साथ उसके स्रोत और उससे जुड़े डिजिटल नेटवर्क की पहचान करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि यदि किसी फर्जी वेबसाइट को समय रहते ब्लॉक कर दिया जाता है, तो संभावित पीड़ितों की संख्या कम की जा सकती है, लेकिन लंबे समय के समाधान के लिए संबंधित साइबर नेटवर्क और वित्तीय लेनदेन की कड़ियों को भी ट्रैक करना होगा।

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60 करोड़ से ज्यादा सोशल मीडिया यूजर्स की निगरानी चुनौती

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक सोशल मीडिया और इंटरनेट पर लगातार बढ़ती सामग्री की निगरानी है। देश में करीब 60 करोड़ लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। हर दिन बड़ी संख्या में तस्वीरें, वीडियो, संदेश और अन्य डिजिटल सामग्री अपलोड होती है।

इतने बड़े डिजिटल इकोसिस्टम में गैरकानूनी सामग्री की पहचान करना आसान नहीं है। खासकर साइबर ठग लगातार नए डोमेन, फर्जी वेबसाइट और सोशल मीडिया अकाउंट बनाकर अपनी गतिविधियां जारी रखते हैं। ऐसे में सरकारी एजेंसियों के लिए तकनीकी निगरानी, डेटा विश्लेषण और त्वरित कार्रवाई का महत्व बढ़ गया है।

‘सहयोग’ सिस्टम से तय प्रक्रिया के तहत कार्रवाई

URL और ऑनलाइन सामग्री को हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सरकार ने ‘सहयोग’ सिस्टम के तहत अधिकृत अधिकारियों की व्यवस्था की है। इसके तहत कोई सामान्य सरकारी कर्मचारी अपनी ओर से किसी ऑनलाइन सामग्री को हटाने का निर्देश नहीं दे सकता। केंद्र या राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अधिकृत अधिकारी ही निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की सिफारिश या निर्देश जारी कर सकते हैं।

अधिकारियों की ओर से दिए गए निर्देशों की समय-समय पर उच्च स्तर पर समीक्षा भी की जाती है, ताकि इस व्यवस्था के दुरुपयोग की संभावना को कम किया जा सके। साइबर अपराध के बदलते स्वरूप को देखते हुए आने वाले समय में URL ब्लॉकिंग के साथ-साथ डिजिटल फॉरेंसिक, वित्तीय ट्रेल और तकनीकी खुफिया जानकारी के इस्तेमाल पर भी जोर बढ़ने की संभावना है।

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