एआई एज-प्रोग्रेशन, सोशल मीडिया ट्रैकिंग, सीसीटीएनएस डेटा एनालिसिस और सरकारी रिकॉर्ड की डिजिटल जांच से पुराने मामलों के आरोपियों की तलाश तेज; सेंटर फॉर पुलिस टेक्नोलॉजी जैसी विशेषज्ञ संस्थाओं की तकनीकी भूमिका भी अहम

तकनीक का शिकंजा: 30-40 साल से फरार बदमाश भी अब पुलिस की नजर से नहीं बच पाएंगे

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By Roopa
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नई दिल्ली: दशकों पहले गंभीर अपराध कर पहचान और ठिकाना बदलकर फरार हुए आरोपियों के लिए अब लंबे समय तक कानून की नजर से बचना मुश्किल होता जा रहा है। पुलिस पुराने और लंबे समय से लंबित मामलों में वांछित आरोपियों की तलाश के लिए डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ा रही है। खास तौर पर 30-40 साल पुराने मामलों में जब पारंपरिक जांच के रास्ते सीमित हो जाते हैं, तब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल फोरेंसिक, डेटा एनालिसिस और अपराध रिकॉर्ड के एकीकरण से नई कड़ियां तलाशने की कोशिश की जा रही है।

वर्ष 1986 और 1991 के हत्या मामलों में दशकों बाद आरोपियों की गिरफ्तारी ने भी दिखाया है कि पुराने मामलों की जांच में तकनीकी संसाधन किस तरह मददगार हो सकते हैं। पुलिस अब केवल मुखबिर तंत्र और पुराने कागजी रिकॉर्ड पर निर्भर रहने के बजाय तस्वीरों, डिजिटल डेटाबेस, सोशल मीडिया गतिविधियों और पहचान संबंधी रिकॉर्ड को आपस में जोड़कर संभावित ठिकानों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।

एआई एज-प्रोग्रेशन से बदले चेहरे की पहचान

पुराने मामलों में सबसे बड़ी चुनौती आरोपी की मौजूदा पहचान करना होती है। पुलिस रिकॉर्ड में मौजूद तस्वीर कई दशक पुरानी हो सकती है, जबकि आरोपी की उम्र और चेहरे की बनावट इस दौरान काफी बदल चुकी होती है।

ऐसे मामलों में एआई आधारित एज-प्रोग्रेशन तकनीक पुराने चेहरे के आधार पर संभावित वर्तमान रूप तैयार करने में मदद कर सकती है। परिवार के सदस्यों की तस्वीरों और उपलब्ध पहचान संबंधी सूचनाओं का विश्लेषण भी जांचकर्ताओं को संभावित व्यक्ति तक पहुंचने में मदद दे सकता है।

हालांकि, तकनीक से तैयार चेहरा अंतिम पहचान का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसका इस्तेमाल जांच के लिए सुराग के तौर पर किया जाता है। इसके बाद दस्तावेज, बायोमेट्रिक रिकॉर्ड, पारिवारिक संबंध और अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों के जरिए पहचान की पुष्टि जरूरी होती है।

सोशल मीडिया से परिवार तक पहुंच

कई फरार आरोपी खुद सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखते हैं, लेकिन उनके रिश्तेदार और परिचित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हो सकते हैं। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तस्वीरों, वीडियो और अन्य डिजिटल गतिविधियों से जांच एजेंसियां संदिग्ध व्यक्ति की संभावित मौजूदगी के संकेत तलाश सकती हैं।

शादी, पारिवारिक समारोह या सामाजिक कार्यक्रमों की तस्वीरों में दिखाई देने वाले लोगों का तकनीकी विश्लेषण पुराने रिकॉर्ड में मौजूद संदिग्धों से संभावित मिलान तलाशने में मदद कर सकता है। पोस्ट से जुड़े उपलब्ध स्थान और समय संबंधी संकेत भी जांच को आगे बढ़ा सकते हैं।

सीसीटीएनएस से जुड़ती हैं पुराने अपराध की कड़ियां

लंबे समय से फरार आरोपी अक्सर दूसरे राज्य में नाम या पहचान बदलकर बस जाते हैं। ऐसे मामलों में अपराध और पुलिस रिकॉर्ड के डिजिटल डेटाबेस जांचकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण स्रोत बन रहे हैं।

सीसीटीएनएस में उपलब्ध अपराध संबंधी रिकॉर्ड, संदिग्धों की जानकारी और पहचान से जुड़े डेटा का विश्लेषण कर पुराने आरोपियों की नई गतिविधियों से संभावित संबंध तलाशे जा सकते हैं। किसी नए मामले में दर्ज फिंगरप्रिंट या दूसरे पहचान संबंधी रिकॉर्ड का पुराने आपराधिक रिकॉर्ड से मिलान होने पर दशकों पुराने मामले की जांच को महत्वपूर्ण सुराग मिल सकता है।

सेंटर फॉर पुलिस टेक्नोलॉजी की भूमिका

पुलिसिंग में तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच सेंटर फॉर पुलिस टेक्नोलॉजी जैसे तकनीकी और प्रशिक्षण केंद्रों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे संस्थानों के माध्यम से पुलिसकर्मियों को डिजिटल फोरेंसिक, डेटा एनालिटिक्स, साइबर जांच, आधुनिक पहचान तकनीकों और तकनीक आधारित पुलिसिंग के नए तरीकों से परिचित कराया जा सकता है।

तकनीकी विशेषज्ञता और जमीनी पुलिसिंग के संयोजन से पुराने मामलों में उपलब्ध बिखरी सूचनाओं को एक साथ जोड़ना आसान हो सकता है। खास तौर पर ऐसे मामलों में जहां आरोपी ने वर्षों पहले अपनी पहचान बदल ली हो, तकनीकी विश्लेषण जांच की दिशा तय करने में मददगार साबित हो सकता है।

सरकारी रिकॉर्ड से भी खुल सकता है पुराना राज

फरार आरोपी कई बार दूसरे शहरों या राज्यों में सामान्य नागरिक की तरह रहने लगते हैं। कोई सुरक्षा गार्ड, मजदूर, चालक, रिक्शा चालक, निर्माण श्रमिक या छोटा कारोबारी बनकर वर्षों तक अपनी पहचान छिपा सकता है। ऐसे में कानूनी प्रक्रिया के तहत उपलब्ध सरकारी और पहचान संबंधी रिकॉर्ड जांच का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

नाम, पते, पुराने पहचान रिकॉर्ड और उपलब्ध बायोमेट्रिक विवरण के मिलान से संदिग्ध व्यक्ति की पहचान का सुराग हासिल किया जा सकता है। हालांकि, किसी भी डिजिटल मिलान को अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय पुलिस को स्वतंत्र साक्ष्यों के जरिए उसकी पुष्टि करनी होती है।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के मुताबिक, तकनीक ने पुराने मामलों की जांच में संभावनाएं काफी बढ़ाई हैं। उनके अनुसार, डिजिटल रिकॉर्ड, चेहरे की पहचान और डेटा एनालिसिस पुलिस को संभावित व्यक्ति या ठिकाने तक पहुंचा सकते हैं, लेकिन तकनीकी संकेतों को स्वतंत्र साक्ष्यों से सत्यापित करना जरूरी है। पुराने मामलों में कई अलग-अलग स्रोतों से मिली सूचनाओं को जोड़ना जांचकर्ताओं के लिए खास तौर पर उपयोगी हो सकता है।

तकनीकी जांच के बढ़ते इस्तेमाल ने फरार आरोपियों के लिए पहचान छिपाकर दशकों तक सामान्य जीवन जीना कठिन कर दिया है। हालांकि, डिजिटल तकनीक पारंपरिक पुलिस जांच का विकल्प नहीं बल्कि उसका सहयोगी माध्यम है। पुराने जघन्य मामलों में तकनीकी सुराग, दस्तावेजी रिकॉर्ड, फोरेंसिक साक्ष्य और जमीनी जांच को एक साथ इस्तेमाल करने से दशकों पुरानी जांच को फिर से गति मिल सकती है।

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