नई दिल्ली: ATM से चार अनधिकृत निकासी और दो संदिग्ध बैंक हस्तांतरण के मामले में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को बड़ा झटका लगा है। दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बैंक की अपील खारिज करते हुए ग्राहक को ₹1.30 लाख भुगतान करने का आदेश बरकरार रखा है। आयोग ने माना कि बैंक शिकायत मिलने के बाद संबंधित ATM की CCTV फुटेज और अन्य जरूरी रिकॉर्ड सुरक्षित रखने तथा पेश करने में विफल रहा। आयोग ने इसे सेवा में कमी माना।
मामला वर्ष 2018 का है। ग्राहक वर्ष 2002 से SBI में खाता चला रहा था और सरकारी स्कूल में प्रयोगशाला सहायक के रूप में मिलने वाला वेतन इसी खाते में जमा होता था। 10 अक्टूबर 2018 को उसने SBI के एक ATM से ₹5,000 निकाले थे। उस समय खाते में ₹1,12,472 शेष थे। अगले दिन ₹17,540 और जमा हुए, जिसके बाद खाते की कुल राशि ₹1,30,012 हो गई।
22 अक्टूबर को ग्राहक ATM से पैसे निकालने पहुंचा, लेकिन पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण निकासी असफल हो गई। इसके बाद उसने पासबुक अपडेट कराई तो खाते से हुई संदिग्ध निकासी का पता चला। रिकॉर्ड के अनुसार, 12 अक्टूबर को उसके खाते से ₹20,000 की चार ATM निकासी की गई थीं। इस तरह कुल ₹80,000 खाते से निकाल लिए गए थे।
उसी दिन खाते से ₹40,000 और ₹10,000 दो अलग-अलग हस्तांतरण भी किए गए। ये रकम Sonu नाम के व्यक्ति के खाते में भेजी गई थी। ग्राहक ने इन लेनदेन को अधिकृत नहीं किया था।
घटना का पता चलने के बाद ग्राहक ने 22 अक्टूबर 2018 को बैंक में लिखित शिकायत दर्ज कर रकम वापस दिलाने और संदिग्ध लेनदेन की जांच कराने की मांग की। उसी दिन उसने Mayur Vihar Phase-I थाने में प्राथमिकी भी दर्ज कराई। ग्राहक का आरोप था कि इसके बावजूद रकम की वसूली के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
6 मार्च 2019 को उसने बैंक को दोबारा लिखित शिकायत दी, लेकिन उसे संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इसके बाद उसने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
जिला उपभोक्ता आयोग ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि ग्राहक की शिकायत मिलने के बाद बैंक को संबंधित ATM की CCTV फुटेज सुरक्षित रखनी चाहिए थी। आयोग ने यह भी पाया कि ₹40,000 और ₹10,000 के दो हस्तांतरण को लेकर बैंक पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं दे सका।
जिला आयोग ने बैंक को ₹1.30 लाख भुगतान करने का निर्देश दिया था। इसके साथ 12 अक्टूबर 2018 से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, मानसिक परेशानी के लिए ₹5,000 और मुकदमे के खर्च के रूप में ₹5,000 देने का भी आदेश दिया गया था। SBI ने इस आदेश को राज्य आयोग के समक्ष चुनौती दी थी।
दिल्ली राज्य आयोग की पीठ ने कहा कि ग्राहक ने अनधिकृत लेनदेन का पता चलते ही बैंक से संपर्क किया था और विशेष रूप से संबंधित ATM की CCTV फुटेज उपलब्ध कराने की मांग की थी। इसके बावजूद बैंक ने न तो फुटेज सुरक्षित रखी और न ही उसे जिला आयोग या राज्य आयोग के सामने पेश किया।
आयोग ने कहा कि ATM लेनदेन से संबंधित इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, ATM जर्नल, स्विच रिकॉर्ड और प्रमाणीकरण संबंधी जानकारी बैंक के पास उपलब्ध थी। इसलिए बैंक ही यह साबित करने की स्थिति में था कि विवादित लेनदेन विधिवत अधिकृत और प्रमाणित थे। लेकिन बैंक ने ऐसा कोई ठोस रिकॉर्ड पेश नहीं किया।
आयोग ने यह भी ध्यान दिया कि ग्राहक के अनुसार उसका डेबिट कार्ड कभी खोया नहीं था और न ही उसने किसी अन्य व्यक्ति को सौंपा था। ऐसी स्थिति में बैंक को यह स्पष्ट करना चाहिए था कि कहीं कार्ड की नकल, कार्ड की जानकारी चोरी करने, ATM से छेड़छाड़ या किसी तकनीकी गड़बड़ी के कारण तो निकासी नहीं हुई।
₹40,000 और ₹10,000 के हस्तांतरण पर भी आयोग ने कहा कि ग्राहक ने बैंक शाखा जाने या इन भुगतानों को अधिकृत करने से इनकार किया था। ऐसे में बैंक को संबंधित डेबिट स्लिप, हस्तांतरण वाउचर या अन्य अधिकृत रिकॉर्ड पेश करना चाहिए था, लेकिन वह ऐसा करने में विफल रहा।
आयोग ने माना कि बैंक ने 22 अक्टूबर 2018 और 6 मार्च 2019 की लिखित शिकायतों के बावजूद प्रभावी जांच नहीं की और ग्राहक को उचित जवाब भी नहीं दिया। इन कमियों को सेवा में कमी मानते हुए राज्य आयोग ने जिला आयोग का 21 अगस्त 2023 का आदेश बरकरार रखा। इस तरह SBI को ग्राहक को ₹1.30 लाख, 12 अक्टूबर 2018 से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, ₹5,000 मानसिक परेशानी और ₹5,000 मुकदमा खर्च का भुगतान करना होगा।
