तिरुवनंतपुरम: सोशल मीडिया पर दिखे एक फर्जी ‘कैशबैक’ स्क्रैच कार्ड के जरिए हुए UPI फ्रॉड के मामले में केरल की उपभोक्ता आयोग ने बैंक को ग्राहक के खाते से निकाली गई ₹9,854 की रकम वापस करने का आदेश दिया है। आयोग ने सेवा में कमी मानते हुए बैंक को ₹5,000 मुआवजा और ₹3,000 मुकदमा खर्च के रूप में देने को भी कहा। कुल भुगतान 30 दिन के भीतर करने का निर्देश दिया गया है।
मामला 13 जुलाई 2021 का है। शिकायतकर्ता का फेडरल बैंक में बचत खाता था। उसने आयोग को बताया कि सोशल मीडिया ब्राउज करते समय उसे PhonePe के लोगो और फॉन्ट जैसा दिखने वाला एक स्क्रैच कार्ड नजर आया, जिस पर ‘अनलिमिटेड कैशबैक’ का दावा किया गया था। वह Google Pay और PhonePe का इस्तेमाल करता था और इन प्लेटफॉर्म पर मिलने वाले स्क्रैच कार्ड से परिचित था। इसी वजह से उसने कार्ड को दो बार स्क्रैच किया।
शिकायतकर्ता के अनुसार, इसके तुरंत बाद उसके बैंक खाते से ₹4,885 और ₹4,969 के दो लेनदेन हुए। कुल ₹9,854 की रकम खाते से निकल गई। उसे जल्द ही समझ आया कि वह धोखाधड़ी का शिकार हो चुका है। उसने तत्काल बैंक को दोनों लेनदेन की जानकारी दी और उन्हें अनधिकृत बताया।
शिकायतकर्ता का कहना था कि बैंक ने शुरुआत में मामले को धोखाधड़ी मानते हुए रकम वापस दिलाने का भरोसा दिया। इसके बाद 15 जुलाई 2021 को दोनों लेनदेन की राशि उसके खाते में वापस भी जमा कर दी गई। हालांकि, 4 अगस्त 2021 को बैंक ने यह क्रेडिट रिवर्स कर दिया और ₹9,854 फिर खाते से काट लिए। इसके बाद ग्राहक ने उपभोक्ता आयोग का रुख किया और बैंक पर सेवा में कमी तथा अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप लगाया।
आयोग ने कहा कि शिकायतकर्ता ने अनधिकृत लेनदेन का पता चलने के बाद तत्काल बैंक को सूचना दी और आवश्यक कदम उठाए। इसके बावजूद बैंक ऐसा कोई विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि ग्राहक ने लापरवाही बरती थी या जानबूझकर अथवा अनजाने में अनधिकृत लेनदेन में भाग लिया था।
आयोग ने अपने 5 अगस्त के आदेश में स्पष्ट किया कि केवल ग्राहक की कथित लापरवाही के आधार पर अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन का नुकसान उसी पर नहीं डाला जा सकता। बैंक को यह साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय सामग्री प्रस्तुत करनी होगी कि ग्राहक की लापरवाही या संलिप्तता के कारण रकम निकली।
बैंक की ओर से दलील दी गई कि स्क्रैच कार्ड और उससे जुड़े लेनदेन में उसकी कोई भूमिका नहीं थी। बैंक ने यह भी कहा कि जांच में सामने आया कि ग्राहक नियमित रूप से UPI लेनदेन करता था और उसके खाते से लगभग रोजाना UPI डेबिट होते थे। बैंक के मुताबिक, भुगतान ग्राहक ने स्वयं किया या फिर उसने अपने UPI विवरण किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा किए होंगे।
बैंक ने यह तर्क भी दिया कि UPI भुगतान के लिए भुगतान पता और UPI PIN की आवश्यकता होती है और इन विवरणों के बिना लेनदेन संभव नहीं है। बैंक का दावा था कि दोनों लेनदेन ग्राहक के गोपनीय क्रेडेंशियल के जरिए हुए और इसलिए उसकी सहमति मानी जानी चाहिए।
हालांकि, आयोग ने इन दलीलों को पर्याप्त नहीं माना। आयोग ने कहा कि बैंक केवल यह दिखाकर ग्राहक को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता कि लेनदेन उसके UPI क्रेडेंशियल से हुआ था। जब ग्राहक ने धोखाधड़ी की जानकारी मिलते ही बैंक को शिकायत कर दी और बैंक यह साबित नहीं कर सका कि ग्राहक की वास्तविक लापरवाही थी, तो अनधिकृत लेनदेन से हुए नुकसान की जिम्मेदारी बैंक की बनती है।
आयोग ने बैंक को ₹9,854 की मूल रकम खाते में दोबारा जमा करने के साथ ₹5,000 मुआवजा और ₹3,000 मुकदमा खर्च देने का निर्देश दिया। यह फैसला डिजिटल भुगतान से जुड़े मामलों में ग्राहकों की जिम्मेदारी तय करने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि बैंक को केवल तकनीकी क्रेडेंशियल के इस्तेमाल के आधार पर ग्राहक की गलती मानने के बजाय मामले में वास्तविक लापरवाही या संलिप्तता का प्रमाण देना होगा।
