डिजिटल अरेस्ट के जरिए रकम ऐंठने वाले गिरोह का दिल्ली पुलिस ने किया पर्दाफाश; बैंक कर्मचारी समेत चार गिरफ्तार, म्यूल खातों के जरिए कंबोडिया, UAE और दुबई तक पहुंच रही थी ठगी की रकम

फर्जी ECI वेरिफिकेशन के जाल में फंसा रिटायर्ड RBI कर्मचारी, ₹3.25 लाख गंवाए

Roopa
By Roopa
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हैदराबाद: साइबर अपराधियों ने चुनाव आयोग (ECI) के नाम का दुरुपयोग करते हुए हैदराबाद के अमीरपेट निवासी एक सेवानिवृत्त RBI कर्मचारी को कथित तौर पर ₹3.25 लाख की ठगी का शिकार बना लिया। जालसाजों ने पहले SMS के जरिए 48 घंटे के भीतर वेरिफिकेशन पूरा करने का दबाव बनाया और बाद में WhatsApp पर संपर्क कर खुद को ECI से जुड़ा अधिकारी बताया। भरोसा कायम करने के लिए वीडियो कॉल की गई और महज ₹4 के भुगतान के नाम पर एक संदिग्ध APK फाइल डाउनलोड कराई गई। इसके बाद ₹5 का दोबारा भुगतान कराया गया और कुछ समय बाद पीड़ित के दो बैंक खातों से कुल ₹3.25 लाख डेबिट हो गए।

जानकारी के अनुसार, पीड़ित को 8 अगस्त को एक अज्ञात मोबाइल नंबर से SMS मिला था। संदेश में दावा किया गया कि उसे चुनाव आयोग से संबंधित सत्यापन प्रक्रिया पूरी करनी है और इसके लिए उसके पास केवल 48 घंटे का समय है। अचानक आए संदेश में समयसीमा का उल्लेख होने के कारण पीड़ित को लगा कि प्रक्रिया जरूरी और आधिकारिक हो सकती है। इसी बीच कथित ठग ने WhatsApp के जरिए उससे संपर्क किया और वेरिफिकेशन पूरा कराने की प्रक्रिया समझाने लगा।

आरोपी ने पहले पीड़ित से सिर्फ ₹4 का भुगतान करने को कहा। इसके लिए एक लिंक भेजा गया, जिसके जरिए “ECI-Customer Support (PDF)” नाम की APK फाइल डाउनलोड करने के लिए कहा गया। पीड़ित ने निर्देशों का पालन करते हुए फाइल अपने मोबाइल में डाउनलोड कर ली। इसके बाद कथित ठग ने WhatsApp पर वीडियो कॉल की और खुद को संबंधित अधिकारी के तौर पर पेश किया। वीडियो कॉल का इस्तेमाल पीड़ित के भरोसे को और मजबूत करने के लिए किया गया।

इसके बाद जालसाज ने दावा किया कि ₹4 का भुगतान सफल नहीं हुआ है। उसने पीड़ित को दोबारा भुगतान करने के लिए कहा और इस बार ₹5 जमा करने को कहा। पीड़ित ने यह भुगतान भी कर दिया। दोनों छोटी रकम के लेनदेन के कुछ ही समय बाद उसके बैंक खातों से बड़ी रकम निकल गई। पीड़ित को जब अपने खातों से ₹3.25 लाख डेबिट होने की जानकारी मिली, तब उसे साइबर ठगी का अहसास हुआ।

इसके बाद उसने हैदराबाद साइबरक्राइम पुलिस से शिकायत की। शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। जांच में कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबर, WhatsApp अकाउंट, भेजे गए लिंक, APK फाइल और बैंक खातों में हुए लेनदेन की जानकारी खंगाली जा रही है। पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि रकम किन खातों में पहुंची और ठगी के पीछे कितने लोग शामिल हैं।

साइबर अपराध के बढ़ते तरीकों पर प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि ऐसे मामलों में अपराधी किसी भरोसेमंद सरकारी संस्था की पहचान का इस्तेमाल करके पहले पीड़ित के मन में वैधता का भरोसा पैदा करते हैं और फिर छोटी रकम के भुगतान तथा ऐप डाउनलोड जैसे सामान्य दिखने वाले कदमों के जरिए उसे अपने जाल में आगे बढ़ाते हैं। उन्होंने ऐसे मामलों में अनजान लिंक या APK फाइल डाउनलोड नहीं करने और किसी भी सरकारी सत्यापन प्रक्रिया की पुष्टि संबंधित विभाग के आधिकारिक माध्यम से करने की जरूरत पर जोर दिया।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें ठगी की शुरुआत बड़ी रकम मांगने से नहीं हुई। अपराधियों ने पहले केवल ₹4 और फिर ₹5 का भुगतान कराया। इससे प्रक्रिया सामान्य और सुरक्षित होने का भ्रम पैदा किया गया। इसके बाद मोबाइल में संदिग्ध APK फाइल इंस्टॉल कराकर ठगी को आगे बढ़ाया गया। साइबर अपराधी अक्सर इसी तरह छोटे कदमों के जरिए पीड़ित का भरोसा हासिल करते हैं और फिर आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, किसी सरकारी विभाग या संवैधानिक संस्था के नाम से आया SMS, WhatsApp संदेश या लिंक अपने आप में उसकी प्रामाणिकता साबित नहीं करता। खासकर APK फाइल को किसी अनजान लिंक या संदेश के जरिए डाउनलोड करना जोखिम भरा हो सकता है। मोबाइल में संदिग्ध एप्लिकेशन इंस्टॉल करने से पहले उसके स्रोत और अनुमति की जांच जरूरी है। किसी भी सरकारी वेरिफिकेशन के लिए केवल आधिकारिक वेबसाइट या सत्यापित संपर्क माध्यम का इस्तेमाल करना चाहिए।

हैदराबाद की यह घटना बताती है कि साइबर ठग सरकारी पहचान, समयसीमा और मामूली भुगतान जैसे तरीकों को मिलाकर पीड़ित को मानसिक दबाव में ला रहे हैं। ₹4 और ₹5 जैसे छोटे लेनदेन के पीछे छिपी बड़ी ठगी ने एक बार फिर दिखाया है कि डिजिटल सुरक्षा में छोटी-सी लापरवाही भी बैंक खाते पर भारी पड़ सकती है।

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