पुणे: महाराष्ट्र के पुणे में कथित डिजिटल अरेस्ट के सबसे बड़े मामलों में से एक की जांच के दौरान साइबर पुलिस ने 26 वर्षीय सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर Rohan Rajeshwar Jadhav को गिरफ्तार किया है। उस पर 82 वर्षीय सेवानिवृत्त कारोबारी से ₹10.74 करोड़ से अधिक की साइबर ठगी करने वाले गिरोह का हिस्सा होने का आरोप है। जालसाजों ने पीड़ित को कथित तौर पर जांच एजेंसियों की निगरानी में होने और गिरफ्तारी के बाद सात साल से अधिक की सजा भुगतने का डर दिखाया। इसके बाद फर्जी कोर्ट की सुनवाई और नकली जज के जरिए दबाव बनाकर अलग-अलग बैंक खातों में रकम ट्रांसफर कराई गई।
साइबर पुलिस के अनुसार, Rohan Rajeshwar Jadhav को सोमवार को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के बाद उसे अदालत में पेश किया गया। वह मूल रूप से छत्रपति संभाजीनगर का रहने वाला है और फिलहाल Pimpri-Chinchwad के Pimple Gurav इलाके में रह रहा था। पुलिस के मुताबिक, उसने BSc की पढ़ाई की है और वर्ष 2022 से Instagram पर सक्रिय था। वह बड़ी संख्या में रील्स भी बनाता रहा है। जांचकर्ताओं को संदेह है कि सोशल मीडिया पर उसकी गतिविधियों के अलावा वह एक बड़े साइबर ठगी नेटवर्क से भी जुड़ा हुआ था।
मामले की शुरुआत उस समय हुई जब 82 वर्षीय सेवानिवृत्त कारोबारी को कथित तौर पर कुछ लोगों ने सरकारी जांच एजेंसियों के अधिकारी बनकर संपर्क किया। ठगों ने उन्हें एक कथित आपराधिक मामले में फंसने की बात कही और गिरफ्तारी का डर दिखाया। इसके बाद वीडियो कॉल के माध्यम से फर्जी अदालती कार्यवाही कराई गई। इस दौरान स्क्रीन पर एक नकली जज को पेश किया गया और पीड़ित के खिलाफ कथित अभियोजन की कार्रवाई का नाटक किया गया।
जालसाजों ने पीड़ित को कथित तौर पर बताया कि उसका नाम ‘Naresh Goyal case’ से जुड़े मामले में सामने आया है। उसे जांच एजेंसियों की कार्रवाई और जेल जाने का भय दिखाकर लगातार मानसिक दबाव में रखा गया। डिजिटल अरेस्ट की इसी रणनीति के तहत पीड़ित से कहा गया कि वह जांच में सहयोग करने और अपनी कथित निर्दोषता साबित करने के लिए बताए गए बैंक खातों में रकम जमा करे।
पुलिस के अनुसार, पीड़ित ने जालसाजों की बातों पर भरोसा करते हुए कई mule bank accounts में रकम ट्रांसफर की। अलग-अलग लेनदेन के जरिए कुल ₹10.73 करोड़ से अधिक की राशि कथित तौर पर आरोपियों तक पहुंची। पुलिस अब इन सभी लेनदेन की जांच कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि रकम किन खातों में गई और बाद में उसे किस तरह निकाला या दूसरे खातों में भेजा गया।
जांच के दौरान साइबर पुलिस ने लेनदेन का तकनीकी विश्लेषण किया। इससे कथित तौर पर कई ऐसे बैंक खातों की पहचान हुई, जिनमें ठगी की रकम ट्रांसफर की गई थी। इसी जांच के आधार पर पुलिस को नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों के बारे में जानकारी मिली और Rohan Rajeshwar Jadhav का नाम भी सामने आया।
इस मामले में पुलिस पहले ही Shubham Dhanatole, 26, और 24 वर्षीय एक अन्य आरोपी को 22 फरवरी को गिरफ्तार कर चुकी है। इसके बाद Amar Attargi, 24, को 6 मार्च को गिरफ्तार किया गया था। जांच आगे बढ़ने पर Jadhav को कथित नेटवर्क के एक अन्य सदस्य के रूप में चिन्हित किया गया। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि गिरोह में और कितने लोग शामिल हैं और प्रत्येक आरोपी की भूमिका क्या थी।
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट ठगी में अपराधी पीड़ित को पहले कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारी का भय दिखाकर मानसिक रूप से कमजोर करते हैं। इसके बाद वीडियो कॉल, नकली दस्तावेज और फर्जी अदालत या अधिकारी की भूमिका के जरिए ठगी को वास्तविक जैसा बनाया जाता है। ऐसे मामलों में डर के कारण पीड़ित स्वतंत्र रूप से किसी परिजन या वास्तविक अधिकारी से सत्यापन नहीं कर पाता और धीरे-धीरे बड़ी रकम ट्रांसफर कर देता है।
पुलिस ने लोगों से अपील की है कि CBI, Enforcement Directorate, पुलिस या किसी अन्य सरकारी एजेंसी के अधिकारी बनकर आने वाली धमकी भरी वीडियो कॉल से घबराएं नहीं। वास्तविक जांच और गिरफ्तारी इस तरह वीडियो कॉल के जरिए नहीं की जाती। ऐसे मामलों में तुरंत साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क किया जा सकता है या National Cyber Crime Reporting Portal के माध्यम से शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। पीड़ित अपने नजदीकी पुलिस थाने में भी शिकायत कर सकते हैं।
पुणे का यह मामला दिखाता है कि डिजिटल अरेस्ट गिरोह किस तरह नकली कानूनी कार्यवाही, सरकारी एजेंसियों की पहचान और लगातार मानसिक दबाव का इस्तेमाल कर बुजुर्गों को करोड़ों रुपये की ठगी का शिकार बना रहे हैं। पुलिस अब नेटवर्क के वित्तीय और डिजिटल कनेक्शन की जांच कर रही है।
