नई दिल्ली: IDFC First Bank की चंडीगढ़ शाखा में सामने आए ₹646 करोड़ के कथित बैंकिंग फर्जीवाड़े ने बैंकिंग व्यवस्था के भीतर मौजूद जोखिमों और आंतरिक नियंत्रणों की सीमाओं को उजागर किया है। फरवरी 2026 में सामने आए इस मामले में शाखा के कुछ कर्मचारियों पर ग्राहकों के कुछ कर्मचारियों और बैंक से बाहर के लोगों के साथ मिलीभगत कर अनधिकृत लेनदेन कराने का आरोप है। फर्जी दस्तावेज, बदले हुए चेक और कथित तौर पर नकली सावधि जमा प्रमाणपत्र इस पूरे मामले की कार्यप्रणाली का हिस्सा बताए गए हैं।
बैंक के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी वी. वैद्यनाथन ने वित्त वर्ष 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट में इस घटना को गंभीर बताते हुए कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए था। मामले के सार्वजनिक होने के बाद उन्होंने व्यक्तिगत रूप से चंडीगढ़ पहुंचकर वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात की और बैंक की ओर से जवाबदेही तथा सहयोग का भरोसा दिया।
फर्जी दस्तावेजों के सहारे आगे बढ़े लेनदेन
फोरेंसिक समीक्षा के मुताबिक, कथित फर्जीवाड़े में चंडीगढ़ शाखा के कर्मचारियों, संबंधित ग्राहकों के कुछ कर्मचारियों और बाहरी लोगों के बीच मिलीभगत थी। आरोप है कि अनधिकृत लेनदेन को आगे बढ़ाने के लिए शाखा कर्मचारियों ने संभावित रूप से बदले हुए प्राधिकरण पत्र, चेक और स्वीकृति ईमेल लेनदेन वाउचर के साथ लगाए।
कुछ मामलों में दस्तावेजों पर हस्ताक्षर को लेकर भी असंगतियां पाई गईं। इसके अलावा ऐसे सावधि जमा प्रमाणपत्र तैयार या साझा किए गए, जिनका वास्तविक अस्तित्व नहीं था। कथित तौर पर ब्याज प्रमाणपत्रों और खातों के विवरण में भी बदलाव किया गया। इन दस्तावेजों का इस्तेमाल ग्राहकों के सामने खातों और निवेश से जुड़ी स्थिति को अलग तरीके से प्रस्तुत करने के लिए किया गया।
सरकारी विभाग ने खोला घोटाले का राज
फर्जीवाड़े का पता फरवरी 2026 में तब चला, जब हरियाणा सरकार का एक विभाग अपना खाता बंद कर रकम दूसरी जगह स्थानांतरित करना चाहता था। खाते की वास्तविक शेष राशि और विभाग के रिकॉर्ड में मौजूद राशि में अंतर सामने आने के बाद मामला गंभीर हुआ।
इसके बाद बैंक ने घटना की जांच शुरू की और संबंधित लेनदेन की समीक्षा की। बैंक ने 21 फरवरी को फर्जीवाड़े का खुलासा किया और अगले कारोबारी सोमवार सुबह विश्लेषकों के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल कर घटना की जानकारी दी।
बैंक प्रबंधन के मुताबिक, अपनी शाखा के कर्मचारियों की भूमिका सामने आने के बाद उसने लंबी जांच पूरी होने तक भुगतान रोकने के बजाय प्रभावित पक्ष को उसी कारोबारी दिन रकम की भरपाई कर दी। बैंक ने संबंधित विभागों को रकम के साथ लागू ब्याज भी भुगतान किया और इस घटना की लागत को वित्त वर्ष 2025-26 की मार्च तिमाही के खातों में दर्ज किया।
तकनीकी सुरक्षा के बावजूद मिलीभगत से पार हुए नियंत्रण
IDFC First Bank ने बताया कि उसके पास खातों और लेनदेन की निगरानी के लिए मशीन लर्निंग आधारित प्रणालियों समेत कई तकनीकी और प्रक्रियागत नियंत्रण हैं। इसके बावजूद कई लोगों की मिलीभगत ने इन सुरक्षा उपायों को दरकिनार कर दिया।
यह घटना इस बात का उदाहरण बनी कि अकेले तकनीकी निगरानी किसी बैंकिंग फर्जीवाड़े को पूरी तरह रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती। जब कई पक्ष आपस में मिलकर दस्तावेजों और प्रक्रियाओं का दुरुपयोग करते हैं, तो शाखा स्तर के नियंत्रणों में कमजोरियां पैदा हो सकती हैं।
देशभर में खातों की जांच
बैंक ने चंडीगढ़ मामले के बाद देशभर में व्यापक सत्यापन अभियान चलाया। 28 फरवरी 2026 तक के क्लोजिंग बैलेंस से जुड़े विवरण संबंधित सरकारी खाताधारकों के अलावा ट्रस्ट, एसोसिएशन, सोसाइटी और क्लब खातों को भेजे गए। बैंक के मुताबिक, इस सत्यापन अभियान के दौरान किसी अन्य ग्राहक ने खाते की राशि में ऐसी कोई विसंगति नहीं बताई।
बैंक ने यह भी कहा कि उसके कोर बैंकिंग रिकॉर्ड पूरे घटनाक्रम के दौरान सही रहे। उसका दावा है कि फर्जीवाड़ा मुख्य रूप से शाखा स्तर पर दस्तावेजों और लेनदेन प्रक्रिया में कथित हेरफेर से जुड़ा था।
CEO ने खुद संभाला मोर्चा
फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद वैद्यनाथन का चंडीगढ़ पहुंचना बैंक की प्रतिक्रिया का अहम हिस्सा रहा। उन्होंने वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को बैंक की कार्य संस्कृति और मामले में सही कार्रवाई करने की प्रतिबद्धता का भरोसा दिया। बैंक के अनुसार, अधिकारियों ने उसकी त्वरित प्रतिक्रिया और जिम्मेदारी स्वीकार करने के रवैये की सराहना की।
बैंक ने बाद में शाखा स्तर के प्राधिकरण के ऊपर केंद्रीय टीम की निगरानी सहित अतिरिक्त नियंत्रण लागू किए। ग्राहकों के साथ संवाद और खाते से जुड़ी जानकारी साझा करने की प्रक्रियाओं में भी बदलाव किया गया।
₹646 करोड़ के फ्रॉड का मुनाफे पर असर
फर्जीवाड़े का असर बैंक के वित्तीय प्रदर्शन पर भी पड़ा। वित्त वर्ष 2025-26 में IDFC First Bank का शुद्ध मुनाफा 7 प्रतिशत बढ़कर ₹1,636 करोड़ रहा। वैद्यनाथन ने इसे बैंक की क्षमता के मुकाबले कमजोर प्रदर्शन बताया। उनके अनुसार, यदि फर्जीवाड़े से जुड़ी लागत नहीं होती तो बैंक का मुनाफा करीब ₹2,119 करोड़ रह सकता था, यानी सालाना आधार पर लगभग 39 प्रतिशत की वृद्धि।
बैंक के अनुसार, इस घटना के बावजूद जमा में स्थिरता बनी रही। हालांकि, इसी अवधि के आसपास बैंक ने बचत खातों की ब्याज दरों में कटौती की थी। मामले ने यह जरूर स्पष्ट कर दिया कि अत्याधुनिक तकनीकी सुरक्षा के साथ कर्मचारियों की निगरानी, दस्तावेजों का सत्यापन और स्वतंत्र नियंत्रण भी बैंकिंग सुरक्षा के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
