नोएडा: उत्तर प्रदेश के नोएडा में कोतवाली फेज-3 पुलिस ने देशभर में साइबर ठगी के लिए कथित तौर पर म्यूल बैंक खाते उपलब्ध कराने वाले एक संगठित गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, आरोपी फर्जी कंपनियों के नाम पर बैंक खाते खुलवाकर उन्हें व्हाट्सएप और टेलीग्राम के माध्यम से सक्रिय साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराते थे। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह नेटवर्क ऑनलाइन निवेश ठगी, डिजिटल अरेस्ट, केवाईसी धोखाधड़ी, फर्जी लोन और अन्य वित्तीय साइबर अपराधों में प्रयुक्त धन के लेनदेन को सुगम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था। पुलिस ने मामला दर्ज कर बैंकिंग रिकॉर्ड, डिजिटल साक्ष्यों और वित्तीय लेनदेन की विस्तृत जांच शुरू कर दी है।
पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों की पहचान लखनऊ निवासी अजब सिंह, दिल्ली निवासी प्रदीप, मध्य प्रदेश के विदिशा निवासी गुलाब सिंह लोधी, फर्रुखाबाद निवासी कौशल और सचिन, कन्नौज निवासी जिनेंद्र सिंह तथा आगरा निवासी प्रियंका के रूप में हुई है। अधिकारियों ने बताया कि सभी आरोपी मूल रूप से अलग-अलग जिलों और राज्यों के रहने वाले हैं, लेकिन कथित गतिविधियों के संचालन के दौरान नोएडा के विभिन्न क्षेत्रों में रह रहे थे। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस नेटवर्क में अन्य सहयोगियों, बैंकिंग एजेंटों या फर्जी कंपनियां बनाने वाले व्यक्तियों की भी भूमिका थी या नहीं।
कार्रवाई के दौरान पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से सात मोबाइल फोन, एक चेकबुक, चार कंपनी लेटरहेड और एक स्टैंप पैड बरामद किया है। जांचकर्ताओं का कहना है कि इन दस्तावेजों और उपकरणों का उपयोग कथित रूप से फर्जी व्यावसायिक संस्थाएं दिखाकर बैंक खाते खोलने और उन्हें वैध कारोबारी खातों के रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया जाता था। जब्त किए गए मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल उपकरणों की फोरेंसिक जांच कर चैट, बैंकिंग रिकॉर्ड, संपर्क विवरण और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य एकत्र किए जा रहे हैं।
प्रारंभिक जांच के अनुसार, आरोपी कथित रूप से फर्जी कंपनियों के नाम पर बैंक खाते खुलवाने के बाद व्हाट्सएप और टेलीग्राम समूहों के माध्यम से साइबर अपराधियों से संपर्क करते थे। हालांकि खाते उपलब्ध कराने के बाद भी वे उनसे जुड़ा सिम कार्ड अपने पास रखते थे। पुलिस का आरोप है कि आरोपी अपने मोबाइल फोन में “डिंग एसएमएस” नामक एपीके फाइल इंस्टॉल कर बैंक से आने वाले ओटीपी और लेनदेन संबंधी एसएमएस अपने उपकरणों पर प्राप्त करते थे। इससे साइबर अपराधियों को खातों का उपयोग करने में सहायता मिलती थी, जबकि बैंकिंग संचार पर नियंत्रण आरोपियों के पास बना रहता था। जांच एजेंसियां इस कथित तकनीकी व्यवस्था की भी फोरेंसिक जांच कर रही हैं।
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पुलिस अधिकारियों के अनुसार, म्यूल बैंक खाते संगठित साइबर अपराध का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। ऐसे खातों का उपयोग साइबर ठग ठगी से प्राप्त धन को विभिन्न खातों के माध्यम से स्थानांतरित कर उसकी वास्तविक उत्पत्ति छिपाने के लिए करते हैं। कई मामलों में लोगों को नौकरी, कमीशन या आसान कमाई का लालच देकर उनके नाम पर खाते खुलवाए जाते हैं, जिनमें डिजिटल अरेस्ट, निवेश, केवाईसी, लोन और अन्य साइबर ठगी से प्राप्त राशि जमा कर आगे भेजी जाती है। जांच एजेंसियों का मानना है कि ऐसे नेटवर्क पर कार्रवाई साइबर वित्तीय अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जांच में सामने आया है कि गिरफ्तार आरोपियों से जुड़े बैंक खातों के खिलाफ देशभर में कम से कम 74 साइबर अपराध शिकायतें दर्ज हैं। पुलिस अब विभिन्न राज्यों की साइबर क्राइम इकाइयों और संबंधित बैंकों के साथ समन्वय कर धन के प्रवाह, पीड़ितों की पहचान और पूरे मनी ट्रेल का विश्लेषण कर रही है। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि क्या इसी तरीके से अन्य फर्जी कंपनियां और अतिरिक्त बैंक खाते भी संचालित किए जा रहे थे तथा इस नेटवर्क के तार किसी बड़े अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय साइबर गिरोह से जुड़े हैं।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि म्यूल बैंक खाते आज संगठित साइबर ठगी की सबसे बड़ी कड़ियों में से एक हैं, क्योंकि इनके माध्यम से अपराधी ठगी की रकम को तेजी से कई खातों में स्थानांतरित कर जांच एजेंसियों की कार्रवाई से बचने का प्रयास करते हैं। विशेषज्ञ नागरिकों को सलाह देते हैं कि वे किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर बैंक खाता न खुलवाएं, अपनी बैंकिंग जानकारी, सिम कार्ड या पहचान संबंधी दस्तावेज किसी तीसरे व्यक्ति के साथ साझा न करें और किसी भी संदिग्ध वित्तीय गतिविधि की तुरंत साइबर हेल्पलाइन या स्थानीय पुलिस को सूचना दें। फिलहाल मामले की जांच जारी है और पुलिस का कहना है कि डिजिटल साक्ष्यों, बैंकिंग रिकॉर्ड और वित्तीय विश्लेषण के आधार पर आगे और गिरफ्तारियां हो सकती हैं। सभी आरोप न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं।
