तिरुवनंतपुरम में किराये के कार्यालय से संचालित हो रहा था फर्जी लोन कॉल सेंटर; 41 कंप्यूटर, दो लैपटॉप जब्त, अमेरिकी नागरिकों का डेटा चुराकर देते थे धमकी

लखनऊ में अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाने वाले फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़, मास्टरमाइंड समेत चार गिरफ्तार; 35 एजेंट भी हिरासत में

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By Roopa
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी से जुड़े एक बड़े फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़ करते हुए गिरोह के कथित मास्टरमाइंड समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया है कि आरोपी ऐपल के फर्जी कस्टमर सपोर्ट नंबर का इस्तेमाल कर अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाते थे और तकनीकी सहायता के नाम पर उन्हें डराकर बड़ी रकम वसूलते थे। पुलिस के अनुसार, आरोपियों से मिली जानकारी के आधार पर नेपाल और देश के विभिन्न राज्यों में कार्यरत 35 अन्य एजेंटों को भी हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।

पुलिस के मुताबिक कार्रवाई विभूतिखंड क्षेत्र स्थित एक फ्लैट में देर रात की गई, जहां से फर्जी कॉल सेंटर संचालित किया जा रहा था। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान प्रतापगढ़ निवासी सूरज त्रिपाठी, उसके फुफेरे भाई विवेक पांडेय, राहुल त्रिपाठी और मुंबई के नालासोपारा निवासी आकाश अरुण दत्ता के रूप में हुई है। जांच में सूरज त्रिपाठी को गिरोह का मास्टरमाइंड बताया गया है, जबकि विवेक कॉल सेंटर का संचालन और प्रबंधन देखता था। राहुल कॉलर की भूमिका निभाता था और आकाश कथित तौर पर वीओआईपी (VoIP) सिस्टम संचालित करता था।

प्रारंभिक जांच में पता चला है कि गिरोह ने ऐपल के कस्टमर सपोर्ट से मिलता-जुलता एक फर्जी हेल्पलाइन नंबर तैयार कराया था। आरोप है कि इस नंबर को गूगल पर भुगतान कर प्रमुखता से प्रदर्शित कराया गया, ताकि तकनीकी सहायता की तलाश में अमेरिकी नागरिक सबसे पहले उसी नंबर पर संपर्क करें। जब कोई व्यक्ति इस नंबर पर कॉल करता था तो कॉल वीओआईपी सिस्टम के जरिए सीधे लखनऊ स्थित फर्जी कॉल सेंटर तक पहुंचाई जाती थी।

इसके बाद कॉल सेंटर में मौजूद कर्मचारी खुद को ऐपल का अधिकृत प्रतिनिधि बताकर कॉल करने वाले व्यक्ति का विश्वास जीतते थे। जांच के अनुसार, ग्राहक की बुनियादी जानकारी सत्यापित करने के बाद उसे यह कहकर डराया जाता था कि उसके डिवाइस, बैंक खाते या डिजिटल पहचान से जुड़ी गंभीर सुरक्षा समस्या सामने आई है। इसके समाधान के नाम पर पीड़ितों से विभिन्न माध्यमों से धनराशि जमा कराई जाती थी। पुलिस का दावा है कि पिछले लगभग छह महीनों में इस तरीके से ₹10 करोड़ से अधिक की साइबर ठगी की गई।

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पूछताछ में सूरज त्रिपाठी ने कथित तौर पर बताया कि कॉल सेंटर में काम करने वाले अधिकांश एजेंटों को वास्तविक ठगी की जानकारी नहीं थी। उन्हें केवल इतना बताया गया था कि वे अमेरिका की एक प्रतिष्ठित कंपनी की कस्टमर सपोर्ट सेवा से जुड़े हैं। उन्हें निर्धारित वेतन या प्रदर्शन के आधार पर भुगतान किया जाता था, जबकि कथित साइबर धोखाधड़ी का पूरा संचालन गिरोह के मुख्य सदस्य करते थे।

जांच के दौरान पुलिस ने उत्तराखंड, महाराष्ट्र, गुजरात, नागालैंड, असम, मणिपुर, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा नेपाल में काम कर रहे कुल 35 एजेंटों की पहचान की। इनमें से कई लोगों को हिरासत में लेकर उनकी भूमिका की जांच की जा रही है। पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इनमें से कितने लोगों को अपराध की जानकारी थी और कितने केवल कॉल सेंटर कर्मचारी के रूप में कार्य कर रहे थे।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, साइबर अपराधी अब सर्च इंजन पर फर्जी हेल्पलाइन नंबर प्रमोट कर लोगों का भरोसा जीतने की नई रणनीति अपना रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी तकनीकी सहायता के लिए केवल संबंधित कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट या आधिकारिक ऐप पर उपलब्ध संपर्क विवरण का ही उपयोग करना चाहिए। इंटरनेट पर दिख रहे किसी भी हेल्पलाइन नंबर पर भरोसा करने से पहले उसकी प्रामाणिकता की पुष्टि करना आवश्यक है।

पुलिस ने मामले में डिजिटल उपकरण, सर्वर, कॉल रिकॉर्ड, बैंकिंग लेनदेन और ऑनलाइन भुगतान से जुड़े तकनीकी साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जांच एजेंसियां अब यह पता लगा रही हैं कि गिरोह का नेटवर्क किन अन्य देशों या राज्यों तक फैला था और ठगी की रकम किन बैंक खातों या डिजिटल माध्यमों से स्थानांतरित की गई। मामले की जांच जारी है और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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