नई दिल्ली: यूरोपीय संघ (EU) ने दुनिया की प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनी गूगल पर प्रतिस्पर्धा नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए 89 करोड़ यूरो (करीब ₹8,800 करोड़) का जुर्माना लगाया है। यूरोपीय आयोग का कहना है कि गूगल ने अपने सर्च इंजन और प्ले स्टोर के जरिए बाजार में अपनी मजबूत स्थिति का अनुचित लाभ उठाते हुए प्रतिस्पर्धियों को नुकसान पहुंचाया और डिजिटल बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों का उल्लंघन किया। यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक संबंध पहले से ही तनावपूर्ण बने हुए हैं, जिससे दोनों पक्षों के बीच नया व्यापारिक विवाद गहराने की आशंका भी जताई जा रही है।
यूरोपीय आयोग के अनुसार, जांच में पाया गया कि गूगल ने अपने सर्च इंजन के परिणामों में इस प्रकार बदलाव किए, जिससे उसकी अपनी सेवाओं को प्राथमिकता मिली जबकि प्रतिस्पर्धी कंपनियों की सेवाएं अपेक्षाकृत नीचे दिखाई गईं। आयोग का कहना है कि जब उपयोगकर्ता शॉपिंग, यात्रा, गेमिंग या अन्य डिजिटल सेवाओं से संबंधित खोज करते थे, तब गूगल की व्यवस्था प्रतिस्पर्धी प्लेटफॉर्मों को नुकसान पहुंचाने वाली साबित हुई। नियामकों का मानना है कि इस तरह का व्यवहार यूरोपीय प्रतिस्पर्धा कानूनों के विपरीत है और इससे उपभोक्ताओं की पसंद तथा बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा दोनों प्रभावित होती हैं।
यूरोपीय प्रतिस्पर्धा आयोग की कार्यकारी उपाध्यक्ष टेरेसा रिबेरा ने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन के रूप में गूगल पर विशेष जिम्मेदारी थी कि वह निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करे। उनके अनुसार, कंपनी ने अपनी बाजार शक्ति का उपयोग प्रतिस्पर्धियों को पीछे धकेलने और अपनी सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए किया, जो स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि गूगल प्ले स्टोर के माध्यम से ऐप डेवलपर्स पर ऐसी शर्तें लागू की गईं, जिनसे वे अपने ग्राहकों से सीधे संपर्क नहीं कर पाते थे और उन्हें गूगल की भुगतान प्रणाली तथा कमीशन व्यवस्था का पालन करना पड़ता था।
आयोग ने अपने आदेश में गूगल को 2022 में लागू हुए डिजिटल मार्केट्स एक्ट (Digital Markets Act-DMA) के अनुरूप 60 दिनों के भीतर आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया है। नियामकों ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित अवधि के भीतर कंपनी ने अपने प्लेटफॉर्म में अपेक्षित बदलाव नहीं किए, तो उस पर उसकी वैश्विक वार्षिक आय का पांच प्रतिशत तक अतिरिक्त जुर्माना लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रावधान बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों को यूरोपीय प्रतिस्पर्धा नियमों का प्रभावी ढंग से पालन कराने के उद्देश्य से बनाया गया है।
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इस फैसले का राजनीतिक और आर्थिक महत्व भी माना जा रहा है। हाल के महीनों में अमेरिकी प्रशासन ने कई बार आरोप लगाया है कि यूरोपीय संघ अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों को असमान रूप से निशाना बना रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी यूरोप की डिजिटल नीतियों पर आपत्ति जता चुके हैं और संकेत दिए हैं कि यदि अमेरिकी कंपनियों के साथ कथित भेदभाव जारी रहा तो यूरोपीय उत्पादों पर नए व्यापारिक शुल्क लगाए जा सकते हैं। ऐसे में यूरोपीय आयोग का यह निर्णय दोनों पक्षों के बीच व्यापारिक तनाव को और बढ़ा सकता है।
दूसरी ओर, गूगल ने आयोग के निर्णय पर असहमति जताई है। कंपनी के जनरल काउंसिल केंट वॉकर ने कहा कि यह फैसला प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के बजाय कंपनी के उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता को प्रभावित करेगा। उनका कहना है कि नियामक नियमों का उद्देश्य उपभोक्ताओं के लिए बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराना होना चाहिए, न कि ऐसी बाधाएं उत्पन्न करना जिनसे डिजिटल सेवाओं की उपयोगिता कम हो जाए। गूगल ने संकेत दिया है कि वह निर्णय का कानूनी अध्ययन करने के बाद आगे की कार्रवाई पर विचार करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक जुर्माने तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों की जवाबदेही, प्रतिस्पर्धा कानूनों के भविष्य और विभिन्न देशों के नियामकों की बढ़ती सख्ती का भी महत्वपूर्ण संकेत है। आने वाले समय में इस फैसले का प्रभाव वैश्विक तकनीकी उद्योग, ऐप डेवलपर्स, डिजिटल प्लेटफॉर्म और अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों पर व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है।
