पुणे (महाराष्ट्र): बड़े पैमाने पर होने वाली साइबर ठगी के पीछे काम करने वाले वित्तीय नेटवर्क पर पुलिस ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। पिंपरी-चिंचवड़ पुलिस ने ऑपरेशन म्यूल हंट के तहत उन लोगों की पहचान, बैंक खाते फ्रीज करने और कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की है, जिनके खाते कथित रूप से ऑनलाइन ठगी से हासिल रकम को प्राप्त करने और आगे भेजने के लिए इस्तेमाल किए गए।
जांच अधिकारियों का कहना है कि साइबर अपराधियों के आर्थिक ढांचे को तोड़ना संगठित साइबर अपराध पर नियंत्रण पाने के लिए बेहद जरूरी है। पुलिस अब केवल ठगी करने वाले आरोपियों तक सीमित नहीं रहकर उन लोगों और नेटवर्क तक पहुंचने का प्रयास कर रही है, जो बैंक खातों की व्यवस्था कर साइबर अपराधियों को मदद पहुंचाते हैं।
म्यूल बैंक खाते बने साइबर ठगी का आधार
पुलिस जांच में सामने आया है कि साइबर अपराधी आमतौर पर अपने नाम से बैंक खातों का इस्तेमाल नहीं करते। इसके बजाय वे बेरोजगार युवाओं, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों या ऐसे व्यक्तियों को निशाना बनाते हैं, जिन्हें आसान कमाई या कमीशन का लालच देकर बैंक खाते उपलब्ध कराने के लिए तैयार किया जाता है।
कई मामलों में आरोप है कि लोगों से बैंक खाते, एटीएम कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी और खातों से जुड़े मोबाइल नंबर तक ले लिए जाते हैं। कुछ मामलों में पूरी तरह सक्रिय बैंक खाते बिचौलियों के माध्यम से खरीदे जाने की भी जानकारी सामने आई है।
इन खातों का इस्तेमाल फर्जी निवेश योजनाओं, डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन नौकरी ठगी, वैवाहिक धोखाधड़ी और अन्य साइबर अपराधों से प्राप्त धन को छिपाने और स्थानांतरित करने के लिए किया जाता है।
कई राज्यों की शिकायतों से जुड़े संदिग्ध खाते
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, राष्ट्रीय साइबर अपराध समन्वय प्रणाली से मिले इनपुट और वित्तीय विश्लेषण के आधार पर संदिग्ध बैंक खातों की पहचान की गई है। इन खातों में देश के अलग-अलग राज्यों में दर्ज साइबर अपराध मामलों से जुड़े लेन-देन मिले हैं।
जांच में एक ऐसे बैंक खाते का पता चला, जो कथित रूप से एक किराना व्यवसाय के नाम पर खोला गया था। इस खाते में करीब ₹94 लाख जमा हुए और 11 दिनों के भीतर बड़ी रकम निकाल ली गई। जांचकर्ताओं के अनुसार, यह खाता कई राज्यों में दर्ज साइबर अपराध शिकायतों से जुड़ा पाया गया।
इसी तरह एक वेब डेवलपर के नाम से खोले गए बैंक खाते में कथित रूप से तीन दिनों के भीतर करीब ₹55 लाख के साइबर अपराध संबंधी लेन-देन हुए। एक अन्य रियल एस्टेट कंपनी के नाम से जुड़े खाते में एक सप्ताह के दौरान लगभग ₹20 लाख के लेन-देन दर्ज किए गए, जबकि कंपनी के वास्तविक संचालन को लेकर भी जांच की जा रही है।
खाता उपलब्ध कराने वालों पर संगठित अपराध की कार्रवाई
पुलिस अब म्यूल अकाउंट नेटवर्क को केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं मान रही है, बल्कि इसे संगठित साइबर अपराध का हिस्सा मानकर जांच कर रही है।
जांच अधिकारियों के अनुसार, बैंक खाते उपलब्ध कराने, खाताधारकों की भर्ती करने, ठगी की रकम को कई स्तरों पर स्थानांतरित करने और उसे छिपाने की प्रक्रिया एक सुनियोजित नेटवर्क के तहत संचालित की जाती है।
इस कार्रवाई के जरिए पुलिस का लक्ष्य केवल तत्काल लाभ लेने वालों तक पहुंचना नहीं, बल्कि खाते उपलब्ध कराने वाले एजेंटों, बिचौलियों, फंड नियंत्रित करने वालों और पूरे नेटवर्क की पहचान करना है।
शेल कंपनियों और फर्जी पहचान से बढ़ी चुनौती
जांच में यह भी सामने आया है कि साइबर अपराधी कथित रूप से लोगों के पहचान दस्तावेजों का इस्तेमाल कर फर्जी कंपनियां बनाते हैं और उनके नाम पर ऐसे चालू खाते खोलते हैं, जिनसे बड़े वित्तीय लेन-देन किए जा सकें।
इन खातों के माध्यम से देशभर के पीड़ितों से ठगी गई रकम को आगे भेजा जाता है। पुलिस अब कंपनी पंजीकरण रिकॉर्ड, बैंक विवरण, डिजिटल साक्ष्य और वित्तीय कड़ियों की जांच कर रही है, ताकि असली संचालकों तक पहुंचा जा सके।
पुलिस ने लोगों को किया सतर्क
पुलिस ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी लालच में अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड, चेकबुक या इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी किसी अन्य व्यक्ति को उपलब्ध न कराएं।
अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि साइबर अपराधी अक्सर कंपनी भुगतान, जीएसटी रिफंड, गेमिंग कमाई या लोन प्रक्रिया के नाम पर लोगों को खातों के इस्तेमाल के लिए तैयार करते हैं।
यदि किसी व्यक्ति का बैंक खाता साइबर ठगी की रकम को छिपाने या ट्रांसफर करने में इस्तेमाल होता है, तो उसे भी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
पुलिस के अनुसार, साइबर अपराध से लड़ाई अब केवल डिजिटल सबूत जुटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन वित्तीय रास्तों को बंद करना भी जरूरी है, जिनके सहारे अपराधी लगातार ठगी को अंजाम देते हैं। ऑपरेशन म्यूल हंट के जरिए पुलिस साइबर अपराधियों की आर्थिक व्यवस्था को तोड़ने की दिशा में कार्रवाई कर रही है।
