निवेश, पार्ट-टाइम जॉब और डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर फ्रॉड में इस्तेमाल हुए खातों का खुलासा; तीन FIR दर्ज, धन शोधन नेटवर्क की भी जांच जारी

नासिक में साइबर अपराध पर बड़ा खुलासा, 58 म्यूल बैंक खाते चिन्हित; ₹79 लाख के संदिग्ध लेनदेन की जांच तेज

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By Roopa
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नासिक (महाराष्ट्र): महाराष्ट्र के नासिक शहर में साइबर पुलिस ने साइबर अपराध के खिलाफ चल रही जांच के दौरान 58 ऐसे म्यूल बैंक खातों का पता लगाया है, जिनका उपयोग देशभर में साइबर ठगी से प्राप्त धन के लेनदेन के लिए किया गया। प्रारंभिक जांच में इन खातों के माध्यम से लगभग ₹79 लाख के संदिग्ध वित्तीय लेनदेन सामने आए हैं। पुलिस ने अब तक भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत धोखाधड़ी और संगठित अपराध से जुड़े प्रावधानों में तीन प्राथमिकी दर्ज की हैं तथा पूरे नेटवर्क की जांच जारी है।

साइबर पुलिस के अनुसार, साइबर अपराधी निवेश योजनाओं, पार्ट-टाइम नौकरी, वर्क फ्रॉम होम, डिजिटल अरेस्ट और अन्य झूठे बहानों से लोगों को अपने जाल में फंसाकर विभिन्न बैंक खातों में धनराशि स्थानांतरित करवाते हैं। इसके बाद ठगी की रकम को कई अन्य खातों में ट्रांसफर किया जाता है या खाता धारकों अथवा उनके सहयोगियों की मदद से नकद निकाला जाता है, जिससे धन के स्रोत का पता लगाना कठिन हो जाता है।

अधिकारियों ने बताया कि देशभर के पीड़ित राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCCRP) पर शिकायत दर्ज कराते हैं। राज्य साइबर विभाग से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर नासिक साइबर पुलिस ने ऐसे बैंक खातों की जांच शुरू की, जिनका उपयोग विभिन्न राज्यों में साइबर ठगी के मामलों में किया गया था। रिकॉर्ड का विश्लेषण करने पर नासिक शहर के 58 बैंक खाते संदिग्ध पाए गए, जिनके माध्यम से अब तक लगभग ₹79 लाख के लेनदेन का पता चला है।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि प्रत्येक खाते के वास्तविक संचालक, लाभार्थी, धन के प्रवाह और खातों के पीछे सक्रिय साइबर गिरोह की पहचान करने के लिए बैंकिंग रिकॉर्ड, डिजिटल ट्रांजैक्शन, केवाईसी दस्तावेज, मोबाइल नंबर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच की जा रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि संबंधित खाताधारकों ने जानबूझकर अपने खाते साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराए थे या वे स्वयं भी ठगी का शिकार बने।

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जांच एजेंसियां संदिग्ध खातों से जुड़े अन्य बैंक खातों, वित्तीय लेनदेन की श्रृंखला और संभावित अंतरराज्यीय नेटवर्क की भी जांच कर रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि साइबर अपराधी लगातार नई तकनीकों और सोशल इंजीनियरिंग तरीकों का इस्तेमाल कर लोगों को ठग रहे हैं, जिससे हर वर्ष करोड़ों रुपये की साइबर ठगी होती है। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी व्यक्ति को कमीशन या किराये के बदले अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड, चेकबुक या इंटरनेट बैंकिंग सुविधा उपलब्ध न कराएं।

फ्यूचर क्राइम रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार, म्यूल बैंक खाते संगठित साइबर अपराध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। साइबर अपराधी डिजिटल अरेस्ट, निवेश धोखाधड़ी, ट्रेडिंग स्कैम, नौकरी के झांसे, फर्जी लोन और अन्य ऑनलाइन ठगी से प्राप्त धन को ऐसे खातों के माध्यम से तेजी से विभिन्न स्तरों पर स्थानांतरित करते हैं, जिससे जांच एजेंसियों के लिए वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, नागरिकों को किसी भी परिस्थिति में अपना बैंक खाता, डेबिट कार्ड, यूपीआई आईडी या इंटरनेट बैंकिंग सुविधा किसी अन्य व्यक्ति को उपयोग के लिए नहीं देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि थोड़े से कमीशन के लालच में उपलब्ध कराया गया बैंक खाता भी मनी लॉन्ड्रिंग और साइबर अपराध की जांच में कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकता है। उन्होंने लोगों से किसी भी संदिग्ध साइबर गतिविधि की सूचना तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर देने की अपील की, ताकि समय रहते धनराशि फ्रीज कर पीड़ितों की सहायता की जा सके।

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