नई दिल्ली। सीमा सुरक्षा बल (BSF) की कांस्टेबल भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां प्रशिक्षण शुरू होने के लगभग 12 दिन बाद हुई बायोमेट्रिक जांच ने कथित भर्ती फर्जीवाड़े का खुलासा कर दिया। जांच एजेंसियों के अनुसार, भर्ती परीक्षा में सफल होकर प्रशिक्षण केंद्र तक पहुंच चुके एक युवक के फिंगरप्रिंट अंतिम सत्यापन के दौरान मेल नहीं खाए, जिसके बाद पूरे मामले की जांच शुरू की गई। अधिकारियों को आशंका है कि भर्ती प्रक्रिया के महत्वपूर्ण चरणों में किसी “सॉल्वर” या प्रॉक्सी उम्मीदवार का इस्तेमाल किया गया हो सकता है।
जांच के दायरे में आए 24 वर्षीय शिव सिंह ने कथित तौर पर स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (SSC) के माध्यम से आयोजित भर्ती प्रक्रिया में सफलता हासिल की थी। उसने चिकित्सा परीक्षण भी पार कर लिया था और नियुक्ति पत्र मिलने के बाद बेंगलुरु स्थित BSF प्रशिक्षण केंद्र में रिपोर्ट कर प्रशिक्षण शुरू कर दिया था। शुरुआती स्तर पर उसकी नियुक्ति को लेकर कोई संदेह नहीं था।
मामले ने तब नया मोड़ लिया जब प्रशिक्षण केंद्र में अंतिम दस्तावेज सत्यापन और बायोमेट्रिक मिलान की प्रक्रिया की गई। अधिकारियों के अनुसार, फिंगरप्रिंट सत्यापन के दौरान सिस्टम ने असंगति दर्शाई। सत्यापन प्रक्रिया को दोबारा और फिर कई बार दोहराया गया, लेकिन परिणाम समान रहे। इसके बाद अधिकारियों ने मामले को गंभीरता से लेते हुए विस्तृत जांच शुरू की।
प्रारंभिक जांच में संदेह व्यक्त किया गया कि भर्ती परीक्षा और चिकित्सा परीक्षण जैसे महत्वपूर्ण चरणों में वास्तविक उम्मीदवार की जगह किसी अन्य व्यक्ति ने भाग लिया हो सकता है। जांचकर्ताओं के अनुसार, पूछताछ के दौरान यह जानकारी सामने आई कि कथित तौर पर ₹50,000 का भुगतान कर एक अन्य व्यक्ति को चयन प्रक्रिया में शामिल कराया गया था। हालांकि जांच एजेंसियां अभी इस दावे के सभी पहलुओं की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करने में जुटी हैं।
अधिकारियों का मानना है कि कथित योजना के तहत अधिक सक्षम या बेहतर तैयारी वाले व्यक्ति को परीक्षा और अन्य प्रक्रियाओं में शामिल कराया गया, जबकि चयन सुनिश्चित होने के बाद वास्तविक लाभार्थी ने नौकरी ज्वाइन कर ली। यदि यह आरोप सही साबित होता है तो मामला केवल प्रतिरूपण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संगठित भर्ती धोखाधड़ी नेटवर्क की ओर भी संकेत कर सकता है।
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जांच के दौरान यह भी सामने आया कि भर्ती प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण फरवरी 2025 में ग्वालियर क्षेत्र के एक परीक्षा केंद्र पर आयोजित हुआ था। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने धोखाधड़ी और संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि कथित सॉल्वर कौन था, उसके और उम्मीदवार के बीच संपर्क कैसे स्थापित हुआ तथा क्या इसके पीछे कोई संगठित गिरोह सक्रिय था।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि भर्ती परीक्षाओं में प्रतिरूपण और सॉल्वर गैंग का खतरा लंबे समय से मौजूद है, लेकिन बायोमेट्रिक तकनीक ने ऐसे मामलों का खुलासा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके अनुसार, संगठित गिरोह अक्सर सरकारी नौकरियों की चाह रखने वाले उम्मीदवारों को निशाना बनाते हैं और परीक्षा पास कराने के नाम पर बड़ी रकम वसूलते हैं। उन्होंने कहा कि भर्ती प्रक्रियाओं में बहु-स्तरीय बायोमेट्रिक सत्यापन और डिजिटल निगरानी को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
जांच अधिकारियों के अनुसार, मोबाइल फोन रिकॉर्ड, वित्तीय लेनदेन, परीक्षा केंद्र से संबंधित डेटा और उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज की जांच की जा रही है। यह भी देखा जा रहा है कि क्या इसी नेटवर्क ने अन्य भर्ती परीक्षाओं में भी इसी प्रकार की गतिविधियां संचालित की थीं। मध्य प्रदेश में पूर्व में सामने आए विभिन्न भर्ती घोटालों और सॉल्वर गैंग मामलों को देखते हुए जांच एजेंसियां इस प्रकरण को भी व्यापक परिप्रेक्ष्य में जांच रही हैं।
फिलहाल मामला जांच के अधीन है और एजेंसियां कथित तौर पर शामिल सभी व्यक्तियों की पहचान करने का प्रयास कर रही हैं। अधिकारियों का मानना है कि डिजिटल साक्ष्यों और बायोमेट्रिक रिकॉर्ड के विश्लेषण से भर्ती प्रक्रिया में हुई कथित अनियमितताओं की पूरी तस्वीर सामने आ सकती है।
