छत्तीसगढ़ में जीएसटी व्यवस्था के तहत कथित फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) घोटाले का बड़ा मामला सामने आया है। करीब ₹6.93 करोड़ के इस मामले में स्टील कारोबारी की गिरफ्तारी के बाद कर व्यवस्था में फर्जी बिलिंग और शेल कंपनियों के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच एजेंसियों का कहना है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है और इसके पीछे एक बड़ा नेटवर्क सक्रिय हो सकता है।
गिरफ्तार आरोपी की पहचान ओम किरण इस्पात उद्योग के साझेदार हरीश वाधवानी के रूप में हुई है। आरोप है कि कंपनी ने ऐसे संस्थानों से फर्जी खरीद दिखाकर इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ लिया, जो या तो वास्तविक व्यापारिक गतिविधियों में शामिल नहीं थे या जिनका जीएसटी पंजीकरण बाद में रद्द या निलंबित कर दिया गया था।
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जांच अधिकारियों के अनुसार यह मामला नियमित कर जांच और वित्तीय लेनदेन के विश्लेषण के दौरान सामने आया। रिकॉर्ड, इनवॉइस और रिटर्न की गहन जांच में कई ऐसे लेनदेन पाए गए, जिनमें कागजों पर माल की खरीद दिखाई गई थी, लेकिन वास्तविक रूप से माल के मूवमेंट का कोई ठोस सबूत नहीं मिला। इसी आधार पर फर्जी बिलिंग और गलत टैक्स क्रेडिट की आशंका मजबूत हुई।
आरोप है कि कई लेनदेन ऐसे कंपनियों के जरिए किए गए, जो केवल कागजों पर मौजूद थीं। इन कंपनियों ने बिना किसी वास्तविक आपूर्ति के इनवॉइस जारी किए, जिससे एक ऐसा कृत्रिम व्यापारिक चक्र तैयार किया गया, जिसके आधार पर अवैध टैक्स लाभ लिया गया। जांच एजेंसियों का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था में कई फर्में आपस में बिलिंग कर कर प्रणाली को भ्रमित करती हैं।
सूत्रों के मुताबिक आरोपी पिछले लगभग पांच महीनों से गिरफ्तारी से बचने की कोशिश कर रहा था। इस दौरान उसने विभिन्न अदालतों में अग्रिम जमानत के लिए याचिकाएं दाखिल कीं, लेकिन किसी भी स्तर पर उसे राहत नहीं मिली। मामला अंततः सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा, जहां से भी उसकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद जांच एजेंसी ने उसे गिरफ्तार किया।
विशेषज्ञों के अनुसार इनपुट टैक्स क्रेडिट जीएसटी प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके तहत कारोबारी अपने खरीद पर दिए गए टैक्स को बिक्री पर देय टैक्स से समायोजित कर सकते हैं। लेकिन जब यह लाभ बिना वास्तविक लेनदेन के लिया जाता है, तो इससे सरकार को सीधा राजस्व नुकसान होता है और कर प्रणाली की पारदर्शिता प्रभावित होती है।
कर विशेषज्ञों का कहना है कि फर्जी ITC घोटालों में अक्सर शेल कंपनियों और काल्पनिक लेनदेन का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें एक नेटवर्क के भीतर कई कंपनियां एक-दूसरे को बिल जारी करती हैं ताकि वास्तविक व्यापार का भ्रम पैदा हो सके। जांच एजेंसियां ऐसे मामलों में बैंक लेनदेन, GST रिटर्न, ई-वे बिल और परिवहन रिकॉर्ड का गहन विश्लेषण करती हैं।
वित्तीय अपराध विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे मामलों में तकनीक का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है। प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि आधुनिक आर्थिक अपराध अब केवल पारंपरिक टैक्स चोरी तक सीमित नहीं रहे हैं। अपराधी डिजिटल रिकॉर्ड, फर्जी कॉरपोरेट ढांचे और जटिल ट्रांजैक्शन नेटवर्क का उपयोग कर रहे हैं, जिससे जांच और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है।
अधिकारियों का मानना है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति या कंपनी तक सीमित नहीं है। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि इस नेटवर्क में अन्य कारोबारी संस्थाएं और मध्यस्थ भी शामिल हो सकते हैं। जांच एजेंसियां अब पूरे वित्तीय लेनदेन के प्रवाह को ट्रेस कर रही हैं ताकि पूरे घोटाले का आकार और लाभार्थियों की पहचान की जा सके।
अधिकारियों ने संकेत दिया है कि जांच के आगे बढ़ने पर और गिरफ्तारियां भी हो सकती हैं। फिलहाल जांच टीमें पूरे नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ने और सरकारी राजस्व को हुए संभावित नुकसान का आकलन करने में जुटी हैं।
