वाराणसी। साइबर अपराध की दुनिया में ठग लगातार अपने तरीके बदल रहे हैं और अब उन्होंने ऑनलाइन ठगी से हासिल रकम को छिपाने तथा जांच एजेंसियों की पकड़ से बचाने के लिए एक नई तकनीक अपनानी शुरू कर दी है। जहां पहले साइबर अपराधी ठगी की रकम प्राप्त करने के लिए म्यूल अकाउंट यानी दूसरे लोगों के बैंक खातों का इस्तेमाल करते थे, वहीं अब वे गेमिंग और ऑनलाइन बेटिंग ऐप के वॉलेट तथा खातों का सहारा ले रहे हैं। इस बदलाव ने न केवल साइबर जांच एजेंसियों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है बल्कि पीड़ितों की रकम की रिकवरी को भी पहले से कहीं अधिक जटिल बना दिया है।
साइबर सेल से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, हाल के महीनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें ठगों ने सीधे बैंक खातों में पैसा मंगाने के बजाय ऑनलाइन गेमिंग और बेटिंग प्लेटफॉर्म के जरिए रकम हासिल की। इस नई रणनीति के तहत अपराधी पहले किसी गेमिंग या बेटिंग ऐप पर अपना अकाउंट बनाते हैं। इसके बाद वे उससे जुड़े क्यूआर कोड, पेमेंट लिंक या डिजिटल वॉलेट की जानकारी तैयार कर लेते हैं और ठगी का शिकार हुए लोगों को उसी माध्यम से भुगतान करने के लिए प्रेरित करते हैं।
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जैसे ही पीड़ित व्यक्ति भुगतान करता है, रकम सीधे बैंक खाते में पहुंचने के बजाय पहले गेमिंग वॉलेट या संबंधित ऐप के खाते में जमा हो जाती है। इसके बाद धनराशि कई डिजिटल स्तरों और लेनदेन प्रक्रियाओं से गुजरती है, जिससे उसकी वास्तविक ट्रैकिंग और स्रोत की पहचान करना कठिन हो जाता है। साइबर अपराधी इसी तकनीकी जटिलता का फायदा उठाकर जांच प्रक्रिया को लंबा और उलझाऊ बनाने की कोशिश करते हैं।
साइबर जांचकर्ताओं का कहना है कि पहले म्यूल अकाउंट के जरिए धनराशि का प्रवाह अपेक्षाकृत आसानी से ट्रैक किया जा सकता था, क्योंकि पैसा सीधे किसी बैंक खाते में जाता था। लेकिन गेमिंग और बेटिंग प्लेटफॉर्म के मामलों में रकम पहले डिजिटल वॉलेट में पहुंचती है, फिर उसे विभिन्न माध्यमों से स्थानांतरित या खर्च किया जा सकता है। कई बार अपराधी उसी राशि का उपयोग ऑनलाइन गेम खेलने या सट्टेबाजी में निवेश करने के लिए कर देते हैं, जिससे धन का अंतिम गंतव्य पता लगाना और अधिक कठिन हो जाता है।
वाराणसी साइबर सेल के अधिकारियों के अनुसार हाल में जांच के दौरान 12 से 13 ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें आरोपियों ने गेमिंग या बेटिंग ऐप के वॉलेट का उपयोग किया। कई मामलों में ठगों ने रकम प्राप्त करने के बाद उसे वॉलेट से निकाल लिया, जबकि कुछ मामलों में उसी धनराशि को विभिन्न गेमिंग गतिविधियों में खर्च कर दिया गया। इससे पीड़ितों की रकम वापस दिलाने की प्रक्रिया और अधिक जटिल हो गई।
साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी Prof. Triveni Singh का कहना है कि साइबर अपराधी लगातार नई तकनीकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग कर रहे हैं। उनके अनुसार, अपराधियों का उद्देश्य केवल ठगी करना नहीं होता, बल्कि धन के प्रवाह को इस तरह छिपाना भी होता है कि जांच एजेंसियों को वास्तविक लाभार्थी तक पहुंचने में अधिक समय लगे। सोशल इंजीनियरिंग, डिजिटल वॉलेट और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का संयुक्त उपयोग साइबर अपराध के नए स्वरूप को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑनलाइन भुगतान करते समय उपयोगकर्ताओं को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए। किसी भी अज्ञात क्यूआर कोड, पेमेंट लिंक या संदिग्ध खाते में धनराशि भेजने से पहले उसकी वैधता की पुष्टि करना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति निवेश, नौकरी, लॉटरी, रिफंड या अन्य किसी बहाने से तत्काल भुगतान की मांग करता है, तो उसकी स्वतंत्र रूप से जांच की जानी चाहिए।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि गेमिंग और बेटिंग ऐप का उपयोग स्वयं अपराध नहीं है, लेकिन जब इन्हें अवैध धन के हस्तांतरण और पहचान छिपाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, तब यह कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती बन जाता है। बदलती साइबर अपराध तकनीकों के बीच जांच एजेंसियां भी अपने डिजिटल फोरेंसिक और वित्तीय ट्रैकिंग तंत्र को मजबूत करने में जुटी हैं ताकि ऐसे मामलों में धन की आवाजाही का तेजी से पता लगाया जा सके और पीड़ितों को राहत मिल सके।
