होम लोन चुकाने के बाद मूल संपत्ति दस्तावेज न लौटाने पर दिल्ली उपभोक्ता आयोग ने LIC Housing Finance के खिलाफ ₹10 लाख मुआवजा बरकरार रखा

होम लोन चुकाया, लेकिन लौटे नहीं मूल दस्तावेज: उपभोक्ता आयोग ने LIC Housing Finance को ठहराया जिम्मेदार

Team The420
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नई दिल्ली। दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में LIC Housing Finance को एक उधारकर्ता के मूल संपत्ति दस्तावेज गुम करने के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए ₹10 लाख मुआवजा देने के आदेश को बरकरार रखा है। आयोग ने स्पष्ट कहा कि किसी वित्तीय संस्था को सौंपे गए मूल दस्तावेजों की सुरक्षा उसकी मूलभूत जिम्मेदारी है और उन्हें सुरक्षित वापस न कर पाना सेवा में गंभीर कमी माना जाएगा।

मामला दक्षिण दिल्ली के हौज खास स्थित एक आवासीय संपत्ति से जुड़ा है। शिकायतकर्ता बिंदु रॉय ने दिसंबर 1994 में LIC Housing Finance से मकान खरीदने के लिए ₹1 लाख का होम लोन लिया था। बाद में उन्होंने संपत्ति के नवीनीकरण के लिए ₹2 लाख का अतिरिक्त ऋण भी प्राप्त किया। ऋण के बदले संपत्ति से संबंधित सभी मूल स्वामित्व दस्तावेज कंपनी के पास बंधक सुरक्षा के रूप में जमा कराए गए थे।

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अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायतकर्ता ने अगस्त 2010 में पूरा ऋण चुका दिया था। इसके बाद उन्होंने अपने मूल दस्तावेज वापस मांगे, लेकिन कंपनी उन्हें दस्तावेज लौटाने में विफल रही। शिकायतकर्ता ने अक्टूबर 2010 से लेकर मई 2011, सितंबर 2013 और अप्रैल 2014 तक कई बार लिखित रूप से कंपनी से संपर्क किया, फिर भी दस्तावेजों के संबंध में कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।

मामले की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण प्रमाणपत्र सामने आया जिसने शिकायतकर्ता के दावे को मजबूत आधार प्रदान किया। 31 जनवरी 1996 को जारी इस प्रमाणपत्र में LIC Housing Finance ने स्वयं स्वीकार किया था कि संबंधित संपत्ति कंपनी के पास बंधक है और उसके सभी मूल दस्तावेज उसके कब्जे में हैं। आयोग ने माना कि यह दस्तावेज इस बात का प्रत्यक्ष और ठोस प्रमाण है कि मूल कागजात वास्तव में कंपनी के पास जमा थे।

जब मामला उपभोक्ता मंच तक पहुंचा तो LIC Housing Finance ने दावा किया कि शिकायतकर्ता ने कभी मूल बिक्री विलेख या स्वामित्व दस्तावेज जमा ही नहीं किए थे। कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि जिला आयोग द्वारा दिया गया ₹10 लाख का मुआवजा अत्यधिक है, क्योंकि दस्तावेजों के किसी दुरुपयोग या वित्तीय नुकसान का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है।

कंपनी ने यह भी कहा कि वह शिकायतकर्ता की सहायता के लिए पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने, सार्वजनिक नोटिस प्रकाशित करने और दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां प्राप्त करने की प्रक्रिया का खर्च उठाने को तैयार है। हालांकि आयोग ने माना कि यह प्रस्ताव मूल दस्तावेजों के खो जाने की जिम्मेदारी से कंपनी को मुक्त नहीं कर सकता।

राज्य आयोग ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि दस्तावेज कभी कंपनी के पास जमा नहीं किए गए थे। इसके विपरीत, कंपनी द्वारा जारी प्रमाणपत्र स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि दस्तावेज उसकी अभिरक्षा में थे। आयोग ने टिप्पणी की कि दस्तावेज जमा न होने का दावा बाद में तैयार किया गया बचाव प्रतीत होता है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि मूल संपत्ति दस्तावेज किसी भी संपत्ति मालिक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इनके अभाव में संपत्ति की बिक्री, पुनः बंधककरण, उत्तराधिकार संबंधी प्रक्रियाओं या किसी अन्य वित्तीय लेनदेन में गंभीर बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। कई बार खरीदार और वित्तीय संस्थान भी ऐसे मामलों में अतिरिक्त जोखिम महसूस करते हैं, जिससे संपत्ति के मूल्य और उपयोगिता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

फैसले में कहा गया कि बैंक और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां ग्राहकों द्वारा सौंपे गए दस्तावेजों की संरक्षक होती हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे रिकॉर्ड प्रबंधन और दस्तावेज सुरक्षा के उच्च मानकों का पालन करें। यदि वे इस दायित्व को निभाने में विफल रहती हैं तो उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत उन्हें जवाबदेह ठहराया जा सकता है।

सभी तथ्यों, दस्तावेजी साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद राज्य आयोग ने जिला आयोग के आदेश में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं पाई। परिणामस्वरूप, LIC Housing Finance की अपील खारिज कर दी गई और शिकायतकर्ता को ₹10 लाख मुआवजा देने का आदेश बरकरार रखा गया। उपभोक्ता अधिकारों के क्षेत्र में इस फैसले को एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जो वित्तीय संस्थानों को यह संदेश देता है कि ग्राहकों के मूल दस्तावेजों की सुरक्षा केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गंभीर कानूनी जिम्मेदारी है।

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