समस्तीपुर। बिहार के समस्तीपुर जिले में जमीन से जुड़े एक बड़े फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है, जहां कथित तौर पर फर्जी जमाबंदी तैयार कर करीब 20 बीघा पैतृक जमीन को बेच दिया गया। पीड़ित परिवार ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
मामला जितवारपुर कोठी से जुड़ा है, जहां के मालिक मनीष मोहन शर्मा और शैलेश मोहन शर्मा ने आरोप लगाया है कि उनकी पैतृक संपत्ति को भू-माफियाओं ने साजिश के तहत फर्जी दस्तावेजों के जरिए बेच दिया। यह जमीन उनके पूर्वजों के नाम से दर्ज थी, जिसे कथित रूप से छेड़छाड़ कर किसी अन्य व्यक्ति के नाम कर दिया गया।
पीड़ितों के अनुसार, उन्हें इस फर्जीवाड़े की जानकारी तब मिली जब करीब 10 दिन पहले कुछ लोग उनकी जमीन पर कब्जा करने पहुंचे। इस घटना के बाद उन्होंने दस्तावेजों की जांच कराई, जिसमें सामने आया कि उनकी जमीन की नई जमाबंदी किसी अन्य व्यक्ति के नाम से कर दी गई है।
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आरोप है कि यह पूरा खेल 25 दिसंबर 2025 को, जो कि अवकाश का दिन था, अंचल कार्यालय में किया गया। बताया गया कि छुट्टी के बावजूद कार्यालय में देर रात दस्तावेज तैयार किए गए और उनमें तारीख व समय भी दर्ज किया गया, जिससे मामला और संदिग्ध हो गया है।
इस मामले को स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी गंभीरता से उठाया गया है। क्षेत्र के सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने इस पूरे प्रकरण पर सवाल उठाते हुए कहा कि अवकाश के दिन इस तरह के दस्तावेज तैयार होना अपने आप में गंभीर अनियमितता की ओर इशारा करता है। उन्होंने मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
सोमवार को जमीन के मालिक मनीष और शैलेश, सांसद के साथ समस्तीपुर पहुंचे और जिलाधिकारी को लिखित आवेदन सौंपा। उन्होंने अपने आवेदन में स्पष्ट रूप से कहा है कि उनकी जमीन को भू-माफियाओं और अंचल कर्मियों की मिलीभगत से अवैध तरीके से बेचा गया है।
मनीष मोहन शर्मा ने बताया कि उनके परिवार की यह जमीन वर्षों पुरानी है और इसे फर्जी दस्तावेज बनाकर हड़पने की साजिश रची गई है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
प्रशासनिक स्तर पर इस मामले को गंभीरता से लिया गया है। जिलाधिकारी ने कहा है कि शिकायत प्राप्त हुई है और मामले की जांच कराई जाएगी। जांच के आधार पर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
यह मामला केवल एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करता है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह स्पष्ट होगा कि सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर कर बड़े स्तर पर जमीन घोटाले को अंजाम दिया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि जमीन से जुड़े मामलों में डिजिटल रिकॉर्ड और ऑनलाइन सत्यापन प्रणाली को और मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि इस तरह के फर्जीवाड़े को रोका जा सके। साथ ही, कार्यालयों में कार्यप्रणाली की निगरानी भी जरूरी है, खासकर संवेदनशील विभागों में।
इस घटना ने क्षेत्र में चिंता का माहौल पैदा कर दिया है और आम लोगों में यह सवाल उठने लगा है कि क्या उनकी संपत्ति भी सुरक्षित है। लोगों ने प्रशासन से पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की है।
फिलहाल, मामले की जांच जारी है और प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। पीड़ित परिवार को उम्मीद है कि उन्हें न्याय मिलेगा और उनकी पैतृक संपत्ति वापस दिलाई जाएगी।
यह घटना एक बार फिर यह संकेत देती है कि जमीन से जुड़े मामलों में सतर्कता और समय-समय पर दस्तावेजों की जांच करना बेहद जरूरी है, ताकि किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी से बचा जा सके।
