पंचकूला। साइबर ठगी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई में दिल्ली से संचालित एक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश किया गया है। इस मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जो खुद को बीमा कंपनी का अधिकारी बताकर लोगों से लाखों रुपये की ठगी करते थे। जांच में सामने आया है कि यह पूरा नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से काम करता था, जिसमें फर्जी कॉल सेंटर, नकली पहचान और कई स्तरों पर वित्तीय लेनदेन का इस्तेमाल किया जाता था।
जांच के अनुसार, आरोपी उन लोगों को निशाना बनाते थे जिनके पास बीमा पॉलिसी होती थी। वे पॉलिसी मैच्योरिटी या बकाया लाभ का झांसा देकर संपर्क करते थे। पीड़ित का भरोसा जीतने के लिए उनके पास मौजूद पॉलिसी और व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल किया जाता था, जिसके बाद “फाइनल इंस्टॉलमेंट” या “टैक्स क्लियरेंस” के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए दबाव बनाया जाता था।
इसी तरह के एक मामले में कालका निवासी एक व्यक्ति से ₹1,97,500 की ठगी की गई। पहले उससे ₹98,000 को अंतिम किस्त बताकर जमा कराया गया। इसके बाद ₹99,500 टैक्स के नाम पर मांगे गए। बार-बार पैसे मांगने पर जब पीड़ित को शक हुआ, तो उसने बीमा कंपनी के आधिकारिक कार्यालय से संपर्क किया, जहां उसे ठगी का पता चला। इसके बाद साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके आधार पर जांच शुरू हुई।
कार्रवाई के दौरान आरोपियों के पास से नौ मोबाइल फोन, दस चेक बुक और कई एटीएम कार्ड बरामद किए गए। जांच एजेंसियों का मानना है कि इनका इस्तेमाल फर्जी लेनदेन और अलग-अलग बैंक खातों के संचालन के लिए किया जा रहा था।
जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह एक सुनियोजित तरीके से काम कर रहा था। फर्जी सिम कार्ड के जरिए कॉल किए जाते थे, जबकि किराए पर लिए गए या ‘म्यूल’ बैंक खातों में ठगी की रकम जमा कराई जाती थी। आरोपियों ने फर्जी कॉल सेंटर भी बना रखे थे, जिससे वे एक साथ कई लोगों को निशाना बना सकें और अपनी गतिविधियों को वैध दिखा सकें।
इस मामले में तीन अन्य आरोपियों की संलिप्तता भी सामने आई है, जो फिलहाल रोहतक की एक जेल में बंद हैं। जांच एजेंसियों का मानना है कि ये आरोपी पूरे नेटवर्क के संचालन और पैसों के प्रवाह को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभा रहे थे।
जांच में सामने आया तरीका इस बात की ओर इशारा करता है कि अब साइबर अपराधी तकनीकी हैकिंग से ज्यादा सोशल इंजीनियरिंग का सहारा ले रहे हैं। वे भरोसा और जल्दबाजी का माहौल बनाकर पीड़ितों को बिना सत्यापन के पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर कर देते हैं। कई बार असली जैसी जानकारी और पेशेवर बातचीत के कारण लोग असली और नकली में फर्क नहीं कर पाते।
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जांच एजेंसियों ने यह भी बताया कि गिरफ्तार आरोपी अलग-अलग पेशों से जुड़े हुए हैं, जो दर्शाता है कि साइबर अपराध अब विभिन्न वर्गों के लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। आसान कमाई और कम जोखिम का लालच देकर लोगों को इस तरह के नेटवर्क में शामिल किया जा रहा है, जहां हर व्यक्ति की एक तय भूमिका होती है।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की ठगी लगातार जटिल होती जा रही है। फर्जी कॉल सेंटर और सटीक व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल इसे और अधिक खतरनाक बना देता है।
विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि किसी भी वित्तीय लेनदेन से जुड़े कॉल या मैसेज पर तुरंत भरोसा करने से बचें। संबंधित कंपनी या संस्थान से सीधे संपर्क कर जानकारी की पुष्टि करना जरूरी है।
इसके अलावा, बैंक डिटेल, ओटीपी या अन्य संवेदनशील जानकारी किसी अनजान व्यक्ति के साथ साझा नहीं करनी चाहिए। छोटी सी जानकारी भी बड़े वित्तीय नुकसान का कारण बन सकती है।
यह मामला एक बार फिर बताता है कि साइबर अपराध तेजी से बदल रहा है और इसके खिलाफ सतर्कता बेहद जरूरी है। डिजिटल लेनदेन के बढ़ते उपयोग के साथ ही इस तरह की ठगी के खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं।
जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क की गहराई से पड़ताल कर रही हैं और अन्य संभावित पीड़ितों की पहचान करने में जुटी हैं। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां होने की संभावना जताई जा रही है।
यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि साइबर ठगी अब अकेले घटनाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह संगठित और बहुस्तरीय अपराध का रूप ले चुकी है। ऐसे में जागरूकता और समय पर सत्यापन ही सबसे बड़ा बचाव साबित हो सकता है।
