मेरठ। केंद्रीय सरकारी स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) के सूरजकुंड स्थित कार्यालय में सामने आए एक बड़े भ्रष्टाचार मामले ने विभाग के भीतर चल रहे कथित ट्रांसफर रैकेट और गहरी जड़ें जमा चुकी अनियमितताओं को उजागर कर दिया है। एक कर्मचारी से स्थानांतरण के बदले ₹50,000 की रिश्वत लेने के आरोपों के बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने 19 घंटे तक लगातार तलाशी अभियान चलाकर कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और फाइलें अपने कब्जे में लीं। इस दौरान कई अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम सामने आए हैं, जिन्हें अब पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है।
सूत्रों के अनुसार, सीबीआई की टीम गुरुवार शाम करीब 5 बजे सीजीएचएस कार्यालय पहुंची और विस्तृत जांच शुरू की। प्रारंभिक जांच में स्थानांतरण से जुड़ी फाइलों पर विशेष ध्यान दिया गया, जहां कई संदिग्ध पैटर्न और अनियमितताएं सामने आईं। इस दौरान कार्यालय में मौजूद अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ की गई और कुछ मामलों में मोबाइल फोन अस्थायी रूप से जब्त किए गए।
कार्यालय में जांच के बाद टीम अतिरिक्त निदेशक डॉ. नताशा वर्मा और उनके निजी सहायक सनी को साथ लेकर गंगानगर स्थित आवास पर पहुंची। वहां भी देर रात तक गहन तलाशी अभियान चलाया गया। जांचकर्ताओं ने कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य जुटाए हैं, जो इस कथित रैकेट के पूरे नेटवर्क को समझने में अहम साबित हो सकते हैं। बाद में दोनों को हिरासत में लेकर आगे की कार्रवाई के लिए गाजियाबाद ले जाया गया।
इस कार्रवाई के दौरान सूरजकुंड कार्यालय में देर रात तक तनावपूर्ण माहौल बना रहा। परिसर में आवाजाही को सीमित कर दिया गया और कर्मचारियों को बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई। कुछ कर्मचारियों के परिजन उन्हें खोजते हुए डिस्पेंसरी परिसर तक पहुंच गए। हालांकि, इतनी बड़ी कार्रवाई के बावजूद आसपास के इलाकों में इसकी जानकारी काफी देर बाद ही फैल पाई।
प्रारंभिक जांच में यह संकेत मिले हैं कि स्थानांतरण प्रक्रिया को जानबूझकर जटिल बनाया जाता था, ताकि अवैध आर्थिक लाभ कमाया जा सके। आरोप है कि कर्मचारियों को पहले कम सुविधाजनक स्थानों पर भेजा जाता था और फिर मनचाही पोस्टिंग के नाम पर उनसे पैसे की मांग की जाती थी। जांच एजेंसियों को शक है कि यह कोई एकल घटना नहीं बल्कि कई स्तरों पर फैला एक संगठित तंत्र हो सकता है।
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यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पिछले एक वर्ष में इसी सीजीएचएस केंद्र पर इस तरह की दूसरी बड़ी कार्रवाई हुई है। अगस्त 2025 में भी एक मामले में ₹5 लाख की रिश्वत मांगने के आरोप सामने आए थे और उस समय भी भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत कार्रवाई की गई थी। कम समय में लगातार सामने आए ऐसे मामलों ने विभागीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब जांच एजेंसियां पिछले कुछ वर्षों में हुए स्थानांतरणों के रिकॉर्ड की भी समीक्षा कर रही हैं। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि कितने मामलों में अनियमितताएं हुईं और किन कर्मचारियों से अवैध वसूली की गई। अधिकारियों का मानना है कि मौजूदा शिकायत किसी बड़े नेटवर्क का केवल एक हिस्सा हो सकती है, जो लंबे समय से सक्रिय रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी तंत्र में पारदर्शिता की कमी और प्रक्रियाओं की जटिलता अक्सर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। जब जवाबदेही स्पष्ट नहीं होती और निगरानी कमजोर रहती है, तो इस तरह की अनियमितताओं के लिए अवसर बढ़ जाते हैं। उनका सुझाव है कि मजबूत निगरानी तंत्र और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण ऐसे मामलों को काफी हद तक रोक सकता है।
फिलहाल, सीबीआई द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ रही है। आने वाले दिनों में और खुलासे होने की संभावना है, क्योंकि अधिकारियों से पूछताछ और दस्तावेजों का विश्लेषण जारी है। जांच एजेंसियों ने संकेत दिए हैं कि आगे और गिरफ्तारियां भी हो सकती हैं।
यह कार्रवाई जहां एक ओर भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख को दर्शाती है, वहीं यह भी स्पष्ट करती है कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस और दीर्घकालिक सुधार जरूरी हैं। पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रक्रियाओं को सरल बनाना ही भविष्य में इस तरह के संगठित भ्रष्टाचार को रोकने की दिशा में सबसे प्रभावी कदम साबित हो सकता है।
