जयपुर। साइबर ठगी के बढ़ते मामलों के बीच राजस्थान में एक बड़े और संगठित गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है, जिसने व्हाट्सऐप पर कंपनी के चेयरमैन बनकर एकाउंटेंट से ₹5.30 करोड़ की ठगी कर ली। इस मामले में पुलिस ने राज्यभर में कार्रवाई करते हुए 17 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया है कि यह गिरोह बेहद सुनियोजित तरीके से काम करता था और ठगी की रकम को अलग-अलग खातों, नकदी और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए छिपाने की कोशिश करता था।
मामले की शुरुआत तब हुई जब एक निजी कंपनी के एकाउंटेंट को व्हाट्सऐप पर एक मैसेज मिला, जिसमें खुद को कंपनी का चेयरमैन बताकर तत्काल पैसे ट्रांसफर करने के निर्देश दिए गए। मैसेज में इस्तेमाल की गई प्रोफाइल फोटो और नाम पूरी तरह असली जैसे थे, जिससे एकाउंटेंट को कोई शक नहीं हुआ। निर्देशों को जरूरी समझते हुए उसने अलग-अलग बैंक खातों में कुल ₹5.30 करोड़ ट्रांसफर कर दिए।
कुछ समय बाद जब असली चेयरमैन से बातचीत हुई, तब पूरे मामले का खुलासा हुआ और पीड़ित को ठगी का अहसास हुआ। इसके बाद साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके आधार पर जांच शुरू की गई।
जांच में पता चला कि ठगों ने बेहद चालाकी से फर्जी व्हाट्सऐप प्रोफाइल तैयार की थी और भरोसा जीतने के लिए कंपनी से जुड़े विवरणों का इस्तेमाल किया। इसके बाद पैसे को कई बैंक खातों में ट्रांसफर कराया गया, ताकि ट्रैकिंग मुश्किल हो सके। आगे चलकर इस रकम को नकद निकासी, क्रिप्टोकरेंसी में बदलने और हवाला चैनलों के जरिए इधर-उधर भेजा गया।
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह के सदस्य अलग-अलग भूमिकाओं में काम कर रहे थे। कुछ आरोपी बैंक खाते उपलब्ध कराते थे, कुछ नकदी निकालने का काम करते थे, जबकि अन्य आरोपी रकम को डिजिटल एसेट में बदलने और उसे आगे ट्रांसफर करने में शामिल थे। इस पूरे नेटवर्क में शामिल लोगों को प्रति खाते ₹3,000 से ₹50,000 तक का कमीशन दिया जाता था।
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चौंकाने वाली बात यह रही कि आरोपी अक्सर भीड़-भाड़ वाले स्थानों जैसे चाय की दुकानों पर मिलते थे, जहां वे आपस में कमीशन का बंटवारा करते थे ताकि किसी को शक न हो। गिरफ्तार किए गए आरोपियों में अलग-अलग पेशों से जुड़े लोग शामिल हैं, जिनमें छात्र, छोटे व्यापारी और अन्य कामगार शामिल बताए गए हैं।
जांच एजेंसियों के अनुसार, इस तरह के साइबर अपराध अब केवल तकनीकी हैकिंग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें सोशल इंजीनियरिंग का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। अपराधी पहले भरोसा जीतते हैं, फिर जल्दबाजी और दबाव का माहौल बनाकर बड़े ट्रांजैक्शन करवा लेते हैं।
साइबर अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में सबसे बड़ा हथियार ‘विश्वास’ होता है। जब मैसेज किसी परिचित या वरिष्ठ अधिकारी के नाम से आता है, तो लोग बिना सत्यापन किए ही कार्रवाई कर देते हैं, जिसका फायदा ठग उठाते हैं।
विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि किसी भी वित्तीय लेनदेन से पहले निर्देश देने वाले व्यक्ति की पहचान की पुष्टि करना बेहद जरूरी है। खासतौर पर व्हाट्सऐप या अन्य मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर मिले निर्देशों पर तुरंत भरोसा करने से बचना चाहिए। किसी भी संदिग्ध स्थिति में सीधे फोन कॉल या आधिकारिक माध्यम से पुष्टि करना ही सुरक्षित तरीका है।
साइबर ठगी के इस मामले ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सतर्कता की कमी भारी नुकसान का कारण बन सकती है। तेजी से बदलते साइबर अपराध के तरीकों के बीच अब जागरूकता और सावधानी ही सबसे प्रभावी बचाव बनकर सामने आ रही है।
इस तरह की घटनाएं संकेत देती हैं कि संगठित साइबर गिरोह लगातार नए तरीके अपनाकर लोगों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में हर यूजर के लिए जरूरी है कि वह सतर्क रहे और किसी भी संदिग्ध डिजिटल गतिविधि को नजरअंदाज न करे।
