पीलीभीत। जिले के डीआईओएस (जिला विद्यालय निरीक्षक) कार्यालय से जुड़े करीब ₹5 करोड़ के बहुचर्चित घोटाले में जांच आगे बढ़ने के साथ ही चौंकाने वाले खुलासे सामने आ रहे हैं। पुलिस की कार्रवाई में यह स्पष्ट हुआ है कि मुख्य आरोपी इल्हाम शम्सी ने सरकारी धन को ठिकाने लगाने के लिए अपने रिश्तेदारों और करीबी लोगों के बैंक खातों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। मनी ट्रेल की पड़ताल में सामने आया है कि इन खातों को ‘सेफ जोन’ की तरह इस्तेमाल कर रकम को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर ट्रांसफर किया गया, ताकि जांच एजेंसियों से बचा जा सके।
जांच अधिकारियों के मुताबिक, आरोपी ने सबसे अधिक रकम अपनी पत्नियों और महिला रिश्तेदारों के खातों में भेजी। लुबना के खाते में करीब ₹2.37 करोड़ और अजारा खान के खाते में ₹2.12 करोड़ ट्रांसफर किए गए। इसके अलावा फातिमा के खाते में ₹1.03 करोड़, आफिया के खाते में ₹80 लाख से अधिक, परवीन खातून के खाते में करीब ₹48 लाख, नाहिद के खाते में ₹95 लाख और आशकारा परवीन के खाते में करीब ₹38 लाख रुपये जमा कराए गए। पुलिस का कहना है कि इन खातों के जरिए रकम को कई स्तरों पर घुमाया गया, जिससे उसकी वास्तविक स्रोत तक पहुंचना कठिन हो सके।
गिरफ्तार आरोपियों में लुबना नवी और अजारा खान को मुख्य आरोपी की पत्नियां बताया जा रहा है। एक अन्य पत्नी अर्शी को पहले ही जेल भेजा जा चुका है, जबकि इल्हाम शम्सी फिलहाल उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत पर है। जांच के दौरान यह भी सामने आया है कि आरोपी ने कुछ रकम निजी कंपनियों के खातों में भी ट्रांसफर की थी। बरेली स्थित जेएचएम इंफ्राहोम प्राइवेट लिमिटेड के खाते में ₹90 लाख और ओरिका होम्स बिल्डर के खाते में ₹17.18 लाख रुपये भेजे गए, जिन्हें जांच एजेंसियों ने होल्ड करा दिया है। इसके अतिरिक्त करीब ₹59 लाख की फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) राशि भी फ्रीज की गई है।
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू विभागीय स्तर पर संभावित मिलीभगत को लेकर सामने आया है। जांच में यह संकेत मिले हैं कि जिन आईडी और ऑनलाइन पोर्टल का इस्तेमाल कर सरकारी धन निकाला गया, उनमें डीआईओएस कार्यालय के अलावा वित्त एवं लेखा विभाग और कोषागार से जुड़े कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध रही है। हालांकि, इतने बड़े खुलासे के बावजूद अब तक किसी अधिकारी या कर्मचारी पर ठोस कार्रवाई नहीं होने से सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह नेटवर्क लंबे समय से संरक्षण में चल रहा था।
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पुलिस जांच के अनुसार, आरोपी इल्हाम शम्सी ने शिक्षकों के वेतन बिल की आड़ लेकर इस घोटाले को अंजाम दिया। उसने विभागीय अधिकारियों और बाबुओं का विश्वास जीतकर उनके लॉगिन और सिस्टम एक्सेस का दुरुपयोग किया और फर्जी बिल तैयार कर करोड़ों रुपये अपने नियंत्रण वाले खातों में ट्रांसफर करता रहा। जांच में अब तक 50 से अधिक बैंक खातों का पता चला है, जिनके जरिए यह रकम एक जगह से दूसरी जगह भेजी गई।
इल्हाम की पृष्ठभूमि भी इस मामले में अहम मानी जा रही है। वह बीसलपुर के एक इंटर कॉलेज में चपरासी के पद पर तैनात था और वर्ष 2015 में डीआईओएस कार्यालय में उसकी तैनाती हुई थी। कंप्यूटर की अच्छी जानकारी होने के चलते उसने धीरे-धीरे कार्यालय में अपनी पकड़ मजबूत कर ली। बताया जाता है कि कुछ समय बाद उसका संबद्धीकरण निरस्त कर दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद उसने फिर से कार्यालय में सक्रिय होकर सिस्टम तक पहुंच बना ली और इसी का फायदा उठाकर इस घोटाले को अंजाम दिया।
इस मामले में सात महिला आरोपियों को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम की सराहना की जा रही है। पुलिस अधीक्षक ने टीम को ₹25 हजार का इनाम और प्रशस्ति पत्र देने की घोषणा की है। यह कार्रवाई जांच एजेंसियों के लिए एक अहम सफलता मानी जा रही है।
फिलहाल, जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क की गहराई से पड़ताल कर रही हैं। अधिकारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं, जिससे इस घोटाले की पूरी तस्वीर सामने आएगी। यह मामला न केवल सरकारी धन की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि यदि सिस्टम के भीतर निगरानी कमजोर हो, तो अंदरूनी लोग ही बड़े पैमाने पर आर्थिक अपराध को अंजाम दे सकते हैं।
