गेमिंग ऐप से शुरू हुआ फर्जीवाड़ा, बैंक अधिकारियों समेत आठ जेल में; 30 करोड़ ट्रस्ट खाते में ट्रांसफर का खुलासा

“₹100 करोड़ साइबर ठगी का जाल: ट्रस्टों के जरिए ‘डोनेशन’ बनाकर घुमाए गए पैसे, पांच और संस्थाएं रडार पर”

Roopa
By Roopa
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कानपुर। शहर में सामने आए ₹100 करोड़ के बड़े साइबर ठगी मामले में जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसके तार देश के कई राज्यों तक फैलते नजर आ रहे हैं। बर्रा थाना क्षेत्र की पुलिस ने इस मामले में चार बैंक अधिकारियों समेत आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा है, जबकि फरार सरगनाओं की तलाश में लगातार दबिश दी जा रही है। जांच में अब पांच और ट्रस्टों का नाम सामने आया है, जिनके जरिए ठगी की रकम को ‘डोनेशन’ दिखाकर सफेद किया जाता था।

पुलिस के अनुसार, यह गिरोह एक गेमिंग ऐप के जरिए लोगों को अपने जाल में फंसाता था और फिर अलग-अलग बैंक खातों के माध्यम से ठगी की रकम को कई स्तरों में ट्रांसफर कर देता था। इस पूरी प्रक्रिया में ट्रस्ट, फर्जी कंपनियां और म्यूल खाते अहम भूमिका निभाते थे, जिससे रकम का असली स्रोत छिपाया जा सके।

जांच में सबसे अहम खुलासा कर्नाटक के एक ट्रस्ट से जुड़ा है, जिसके खाते में करीब ₹30 करोड़ की रकम ट्रांसफर की गई थी। आरोप है कि इस रकम को ट्रस्ट के खाते में ‘डोनेशन’ के रूप में दिखाया गया और फिर वहां से 30 प्रतिशत कमीशन काटकर बाकी राशि हवाला के जरिए अलग-अलग स्थानों पर भेज दी गई। पुलिस का मानना है कि यह प्रक्रिया बड़े स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग का हिस्सा थी।

अधिकारियों के मुताबिक, गिरोह की कार्यप्रणाली बेहद सुनियोजित थी। जब ठगी की रकम ₹20 करोड़ से अधिक होती थी, तब उसे ट्रस्ट के खातों में भेजा जाता था। इससे कम रकम को फर्जी जीएसटी फर्मों के नाम पर खोले गए खातों में ट्रांसफर किया जाता था, जबकि छोटी रकम को म्यूल सेविंग अकाउंट्स के जरिए घुमाया जाता था। इस बहुस्तरीय सिस्टम के कारण जांच एजेंसियों के लिए मनी ट्रेल को ट्रैक करना चुनौतीपूर्ण हो जाता था।

बर्रा पुलिस ने गुरुवार को इस मामले में आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा। इनमें बैंकिंग सेक्टर से जुड़े अधिकारी भी शामिल हैं, जिन पर आरोप है कि उन्होंने संदिग्ध खातों को खोलने और संचालित करने में मदद की। गिरफ्तार आरोपियों में धर्मेंद्र सिंह, अमित सिंह, आशीष कुमार, सोनू शर्मा, सतीश पांडेय, तनिष्क गुप्ता और साहिल विश्वकर्मा शामिल हैं।

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जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह के मुख्य सरगना राजवीर सिंह यादव उर्फ ओमकार और आगरा निवासी अंचित गोयल अभी फरार हैं। पुलिस ने दोनों पर ₹25-25 हजार का इनाम घोषित करने की तैयारी शुरू कर दी है। हालांकि, अंचित गोयल के सटीक पते की जानकारी जुटाने के लिए टीम आगरा में लगातार छापेमारी कर रही है।

पुलिस को इस मामले में अहम सुराग एक संदिग्ध बैंक खाते के जरिए मिला, जिसके बाद पूरी जांच का दायरा बढ़ाया गया। खातों के लेनदेन की जांच में यह स्पष्ट हुआ कि रकम पहले एक खाते में आती थी, फिर दूसरे स्तर पर ट्रांसफर होती और अंततः ट्रस्ट या हवाला नेटवर्क के जरिए गायब कर दी जाती थी।

इस पूरे मामले ने न केवल साइबर अपराध के बढ़ते खतरे को उजागर किया है, बल्कि बैंकिंग सिस्टम में मौजूद खामियों को भी सामने ला दिया है। जिस तरह से बैंक अधिकारियों की संलिप्तता सामने आई है, उससे यह स्पष्ट है कि अंदरूनी सहयोग के बिना इस तरह के बड़े आर्थिक अपराध को अंजाम देना मुश्किल है।

जांच एजेंसियां अब हवाला कनेक्शन और संभावित आतंकी फंडिंग के एंगल से भी मामले की पड़ताल कर रही हैं। इसके लिए संबंधित बैंकों से विस्तृत लेनदेन की जानकारी मांगी गई है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि रकम कहां-कहां भेजी गई और किन लोगों तक पहुंची।

फिलहाल, पुलिस इस पूरे नेटवर्क को जड़ से खत्म करने के लिए लगातार कार्रवाई कर रही है। अधिकारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं, जिससे इस साइबर ठगी के जटिल और संगठित तंत्र की पूरी तस्वीर सामने आएगी।

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