नई दिल्ली। देश में बढ़ते वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों ने नियामकों और वित्तीय संस्थानों दोनों की चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) ने एक अहम मांग उठाई है—उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सेंट्रल फ्रॉड रजिस्ट्री (CFR) तक सीधी पहुंच दी जाए। उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, यह प्रस्ताव वित्तीय सेवा विभाग के समक्ष रखा गया है और इस पर विचार जारी है।
हालांकि, इस दिशा में कोई भी कदम उठाने के लिए मौजूदा कानूनी ढांचे में संशोधन की जरूरत पड़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि RBI अधिनियम, 1934 में बदलाव के बिना NBFCs को CFR तक पहुंच देना संभव नहीं होगा।
क्या है सेंट्रल फ्रॉड रजिस्ट्री
सेंट्रल फ्रॉड रजिस्ट्री की स्थापना 2016 में की गई थी। इसका उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में होने वाले धोखाधड़ी मामलों का एक केंद्रीकृत डेटाबेस तैयार करना है। इसमें ₹1 लाख से अधिक के सभी बैंक फ्रॉड मामलों का रिकॉर्ड रखा जाता है। वर्तमान नियमों के तहत इस डेटाबेस तक केवल बैंकों को ही पहुंच प्राप्त है।
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NBFCs का तर्क है कि जब वे भी बड़े पैमाने पर लोन वितरण और वित्तीय सेवाओं में शामिल हैं, तो उन्हें इस महत्वपूर्ण जानकारी से बाहर रखना जोखिम को बढ़ाता है। खासकर ऐसे समय में, जब बैंक और NBFCs के बीच को-लेंडिंग मॉडल तेजी से विस्तार कर रहा है।
बढ़ते फ्रॉड मामलों से बढ़ी चिंता
हालिया आंकड़े इस मांग को और मजबूती देते हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में बैंकिंग फ्रॉड से जुड़े मामलों में ₹21,515 करोड़ की राशि सामने आई, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में ₹16,569 करोड़ थी। यह वृद्धि वित्तीय प्रणाली में बढ़ते जोखिम का संकेत देती है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इन आंकड़ों में NBFCs से जुड़े फ्रॉड शामिल नहीं हैं। ऐसे में उद्योग का कहना है कि यदि उन्हें CFR तक पहुंच मिले, तो वे संदिग्ध ग्राहकों और फ्रॉड पैटर्न की बेहतर पहचान कर पाएंगे और समय रहते जोखिम को कम कर सकेंगे।
को-लेंडिंग मॉडल में बढ़ता जोखिम
बैंक और NBFCs के बीच को-लेंडिंग मॉडल के विस्तार ने इस मुद्दे को और महत्वपूर्ण बना दिया है। इस मॉडल में दोनों संस्थाएं मिलकर ग्राहकों को ऋण प्रदान करती हैं और जोखिम साझा करती हैं।
लेकिन यदि NBFCs के पास फ्रॉड से जुड़ा ऐतिहासिक डेटा उपलब्ध नहीं होगा, तो वे संभावित जोखिमों का सटीक आकलन नहीं कर पाएंगे। इससे न केवल उनके व्यवसाय पर असर पड़ सकता है, बल्कि पूरे वित्तीय तंत्र की स्थिरता भी प्रभावित हो सकती है।
कानूनी चुनौतियां और नीति निर्माण
CFR तक NBFCs की पहुंच देने के लिए कानूनी संशोधन जरूरी होगा। RBI अधिनियम में बदलाव के साथ-साथ डेटा सुरक्षा, गोपनीयता और उपयोग के नियमों को भी स्पष्ट करना होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के डेटा साझा किया गया, तो इससे दुरुपयोग का खतरा भी बढ़ सकता है। इसलिए इस दिशा में संतुलित और सावधानीपूर्ण नीति बनाना जरूरी है।
RBI की नई पहल
इस बीच RBI भी फ्रॉड रोकथाम के लिए नए कदम उठा रहा है। केंद्रीय बैंक “डिजिटल पेमेंट्स इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म” विकसित करने की योजना बना रहा है, जो उन्नत तकनीकों की मदद से रियल-टाइम में फ्रॉड पैटर्न की पहचान करेगा।
इस प्लेटफॉर्म के जरिए बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों के बीच डेटा साझा करना आसान होगा, जिससे धोखाधड़ी के मामलों पर तेजी से कार्रवाई की जा सकेगी।
उद्योग की उम्मीदें
NBFC सेक्टर इस प्रस्ताव को एक बड़ा बदलाव मान रहा है। उनका कहना है कि CFR तक पहुंच मिलने से न केवल फ्रॉड रोकथाम में मदद मिलेगी, बल्कि जोखिम प्रबंधन की क्षमता भी मजबूत होगी।
हालांकि, कुछ विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि ग्राहक डेटा की सुरक्षा और गोपनीयता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
निष्कर्ष: सहयोग से मजबूत होगा वित्तीय तंत्र
NBFCs की यह मांग वित्तीय प्रणाली में बदलते परिदृश्य को दर्शाती है, जहां सहयोग और डेटा साझाकरण की भूमिका लगातार बढ़ रही है। यदि कानूनी संशोधन के जरिए उन्हें CFR तक पहुंच मिलती है, तो यह कदम देश में बढ़ते वित्तीय धोखाधड़ी के खिलाफ एक प्रभावी हथियार साबित हो सकता है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और RBI इस प्रस्ताव पर क्या निर्णय लेते हैं और यह पहल वित्तीय प्रणाली को कितनी मजबूती प्रदान करती है।
