पंचकूला। हरियाणा के सरकारी विभागों से कथित रूप से siphon किए गए फंड से ₹200 करोड़ (₹2,00,00,00,000) से अधिक का सोना खरीदे जाने का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। मामले की जांच कर रही एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि यह घोटाला संगठित तरीके से फर्जी बैंकिंग लेनदेन और शेल कंपनियों के नेटवर्क के जरिए अंजाम दिया गया। इस बीच, मामले में गिरफ्तार छह आरोपियों को अदालत ने आगे की पूछताछ के लिए फिर से रिमांड पर भेज दिया है।
जांच एजेंसी के अनुसार, यह मामला एक बड़े स्तर पर सरकारी धन के दुरुपयोग से जुड़ा है, जिसमें कई स्तरों पर फर्जीवाड़ा कर रकम को अलग-अलग खातों और संस्थाओं के जरिए घुमाया गया। आरोपियों की पहचान अरुण शर्मा, सीमा धीमान, अनुज कौशल, प्रियंका, राजन सिंह कटोदिया और विक्रम वाधवा के रूप में हुई है, जिन्हें अदालत में पेश किया गया।
कैसे हुआ पूरा घोटाला
जांच में सामने आया है कि आरोपियों ने सरकारी विभागों के नाम पर निजी बैंकों में खाते खुलवाए, जबकि इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इन खातों के जरिए बड़े पैमाने पर लेनदेन किए गए, जिनमें कई बार न तो चेक थे और न ही आधिकारिक डेबिट नोट—सिर्फ मौखिक निर्देशों पर ही भुगतान प्रोसेस कर दिए गए।
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इतना ही नहीं, जिन डेबिट नोट्स का इस्तेमाल किया गया, उनमें से कई बिना संबंधित विभागों की पुष्टि के ही क्लियर कर दिए गए। इस तरह फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी फंड को शेल कंपनियों में ट्रांसफर किया गया, जिससे असली स्रोत को छिपाया जा सके।
सोने की खरीद और मनी ट्रेल
जांच एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि siphon किए गए फंड का एक बड़ा हिस्सा सोना खरीदने में लगाया गया। ₹200 करोड़ से ज्यादा का सोना खरीदा गया, जिसे बाद में अलग-अलग माध्यमों से हैंडल किया गया ताकि उसकी असली उत्पत्ति छिपाई जा सके।
इसके अलावा, आरोपियों द्वारा इस अवैध धन से चल-अचल संपत्तियां खरीदने की भी जानकारी सामने आई है। जांच में यह भी देखा जा रहा है कि इस पूरे नेटवर्क में और कौन-कौन शामिल था और किस स्तर पर मंजूरी दी गई।
बैंकों की भूमिका पर भी सवाल
इस पूरे मामले में बैंकों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। एजेंसी ने अदालत को बताया कि कई ट्रांजैक्शन बिना उचित जांच-पड़ताल (due diligence) के प्रोसेस किए गए। दस्तावेजों की सही तरीके से पुष्टि नहीं की गई, जिससे फर्जीवाड़े को अंजाम देना आसान हो गया।
यह भी जांच का विषय है कि क्या बैंक अधिकारियों की लापरवाही थी या इसमें मिलीभगत की संभावना है।
जांच अभी अहम मोड़ पर
एजेंसी का कहना है कि मामला अभी बेहद अहम चरण में है और कई महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच बाकी है। इसमें सरकारी कर्मचारियों की संभावित भूमिका, फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल और ट्रांजैक्शन को मंजूरी देने वाले लोगों की पहचान शामिल है।
इन्हीं कारणों से आरोपियों की कस्टोडियल पूछताछ जरूरी बताई गई, ताकि मनी ट्रेल को पूरी तरह ट्रेस किया जा सके और अन्य सहयोगियों की पहचान हो सके। अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए आरोपियों की रिमांड बढ़ा दी है।
निष्कर्ष: संगठित आर्थिक अपराध का बड़ा उदाहरण
यह मामला दिखाता है कि किस तरह संगठित नेटवर्क के जरिए सरकारी फंड को निशाना बनाया जा सकता है। फर्जी दस्तावेज, बैंकिंग खामियां और शेल कंपनियों का इस्तेमाल कर बड़े स्तर पर आर्थिक अपराध को अंजाम दिया गया।
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, इस घोटाले से जुड़े और भी चौंकाने वाले खुलासे सामने आने की संभावना है। फिलहाल, एजेंसियों की नजर पूरे नेटवर्क को बेनकाब करने और सरकारी धन की रिकवरी पर टिकी हुई है।
