साइबर ठगी मामले में मुंबई हाई कोर्ट ने बैंक जवाबदेही तय करते हुए वरिष्ठ नागरिक के पक्ष में राहत देने वाला बड़ा आदेश सुनाया

साइबर फ्रॉड पर मुंबई हाई कोर्ट सख्त: 15 दिन में दूसरा बड़ा फैसला, बैंक ऑफ बड़ौदा को ₹18.79 लाख लौटाने का आदेश

Team The420
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मुंबई। साइबर धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों के बीच न्यायपालिका ने सख्त रुख अपनाते हुए एक बार फिर पीड़ितों को बड़ी राहत दी है। Bombay High Court ने एक पखवाड़े के भीतर दूसरा अहम फैसला सुनाते हुए Bank of Baroda को एक वरिष्ठ नागरिक को ₹18.79 लाख वापस करने का निर्देश दिया है। अदालत का यह आदेश बैंकिंग सिस्टम में जवाबदेही तय करने और साइबर फ्रॉड मामलों में पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

इससे पहले, 6 अप्रैल को इसी अदालत ने HDFC Bank को पुणे के एक बिजनेस कंसल्टेंसी फ्रीलांसर के खाते में ₹38.04 लाख वापस करने का आदेश दिया था। लगातार दो बड़े फैसलों ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि साइबर धोखाधड़ी के मामलों में अदालतें अब बैंकों की भूमिका और जिम्मेदारी को गंभीरता से देख रही हैं।

वरिष्ठ नागरिक को मिला न्याय

ताजा मामले में पीड़ित एक वरिष्ठ नागरिक हैं, जिनके खाते से साइबर ठगी के जरिए लाखों रुपये निकाल लिए गए थे। अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि बैंक की ओर से समय रहते पर्याप्त सतर्कता और सुरक्षा उपाय नहीं अपनाए गए, जिसके कारण धोखाधड़ी संभव हो पाई।

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अदालत ने स्पष्ट किया कि बैंक केवल लेनदेन के माध्यम नहीं हैं, बल्कि ग्राहकों की जमा पूंजी की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है। इसी आधार पर अदालत ने बैंक ऑफ बड़ौदा को निर्देश दिया कि वह पीड़ित को पूरी राशि वापस करे।

पहले भी दिया गया था बड़ा आदेश

इससे पहले 6 अप्रैल को दिए गए फैसले में, पुणे के एक फ्रीलांसर के साथ हुई साइबर ठगी में अदालत ने HDFC बैंक को जिम्मेदार ठहराया था। उस मामले में ₹38.04 लाख की राशि धोखाधड़ी के जरिए ट्रांसफर कर ली गई थी।

अदालत ने कहा था कि यदि बैंकिंग सिस्टम में समय पर अलर्ट, ट्रांजेक्शन मॉनिटरिंग और फ्रॉड डिटेक्शन मैकेनिज्म प्रभावी तरीके से काम करते, तो नुकसान को रोका जा सकता था। इस फैसले ने भी बैंकिंग सेक्टर में हलचल पैदा कर दी थी।

बैंकों की जिम्मेदारी पर स्पष्ट संदेश

दोनों मामलों में अदालत का रुख यह दर्शाता है कि साइबर फ्रॉड को केवल “ग्राहक की गलती” बताकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि डिजिटल बैंकिंग के इस दौर में बैंकों को अपने सिस्टम को अधिक सुरक्षित और जवाबदेह बनाना होगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, ये फैसले एक मिसाल के तौर पर देखे जा रहे हैं, जहां अदालत ने यह माना कि यदि बैंक की ओर से सुरक्षा में चूक होती है, तो उसका खामियाजा ग्राहकों को नहीं भुगतना चाहिए।

साइबर अपराधों के बढ़ते मामलों पर चिंता

देशभर में साइबर धोखाधड़ी के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। फिशिंग, फर्जी कॉल, लिंक और सोशल इंजीनियरिंग जैसे तरीकों से अपराधी लोगों को निशाना बना रहे हैं। खासतौर पर वरिष्ठ नागरिक और डिजिटल रूप से कम जागरूक लोग ऐसे अपराधों का शिकार अधिक बन रहे हैं।

प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि “आज के समय में साइबर अपराधी तकनीकी हैकिंग से ज्यादा सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे लोगों के भरोसे और डर का फायदा उठाकर बैंकिंग जानकारी हासिल करते हैं।”

ग्राहकों के लिए भी जरूरी सावधानी

हालांकि अदालत ने बैंकों की जिम्मेदारी तय की है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ग्राहकों को भी सतर्क रहना बेहद जरूरी है। किसी भी अनजान कॉल, लिंक या OTP साझा करने से बचना चाहिए।

साथ ही, यदि किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविधि नजर आए, तो तुरंत बैंक और संबंधित एजेंसियों को सूचित करना चाहिए, ताकि नुकसान को कम किया जा सके।

बैंकिंग सिस्टम के लिए चेतावनी

मुंबई हाई कोर्ट के ये लगातार दो फैसले बैंकिंग सेक्टर के लिए एक चेतावनी के रूप में देखे जा रहे हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि यदि बैंकों ने अपने सुरक्षा ढांचे को मजबूत नहीं किया, तो उन्हें कानूनी और वित्तीय दोनों तरह के परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

आने वाले समय में इस तरह के और फैसले देखने को मिल सकते हैं, जिससे साइबर फ्रॉड मामलों में न्याय प्रक्रिया और अधिक सख्त हो सकती है।

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