मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस और अस्पतालों के रवैये को बताया “शर्मनाक और संवेदनहीन”, जांच, इलाज में लापरवाही और एनकाउंटर पर उठे गंभीर सवाल

गाजियाबाद में 4 साल की बच्ची से बर्बरता मामला: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, पुलिस कमिश्नर को व्यक्तिगत पेशी का आदेश

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By Roopa
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के नंदग्राम इलाके में 4 साल की मासूम बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या के जघन्य मामले में पुलिस और प्रशासन के रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गहरी नाराजगी जताते हुए पुलिस की शुरुआती कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं और इसे “शर्मनाक और संवेदनहीन” बताया है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त (CP), जांच अधिकारी और नंदग्राम थाने के SHO को 13 अप्रैल को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया है। साथ ही उन्हें मामले से जुड़े सभी मूल दस्तावेज साथ लाने के निर्देश दिए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एक नाबालिग बच्ची से जुड़े इतने गंभीर अपराध में जिस तरह की शुरुआती जांच और कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई, वह कई सवाल खड़े करती है। अदालत ने संकेत दिया कि प्रारंभिक स्तर पर जांच में गंभीर खामियां और लापरवाही दिखती है।

इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को भी नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया है। कोर्ट ने सरकार से घटना के बाद उठाए गए कदमों और जांच प्रक्रिया का पूरा विवरण मांगा है।

अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, आरोपी ने बच्ची को चॉकलेट का लालच देकर सुनसान स्थान पर ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया और बाद में ईंट से सिर पर वार कर उसकी हत्या कर दी। इस क्रूर घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है।

सुनवाई के दौरान सबसे अहम मुद्दा यह उठा कि क्या बच्ची पुलिस कार्रवाई के समय जीवित थी या नहीं। पुलिस ने दावा किया कि जब सूचना मिली तब तक बच्ची की मौत हो चुकी थी, लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि वीडियो सबूत मौजूद है जिसमें बच्ची उस समय जीवित दिखाई दे रही है। इस दावे ने जांच की टाइमलाइन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दो निजी अस्पतालों द्वारा इलाज से कथित इनकार पर भी सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आपात स्थिति में इलाज न देना गंभीर नैतिक और कानूनी सवाल पैदा करता है। दोनों अस्पतालों की भूमिका की जांच के निर्देश दिए गए हैं।

इसके अलावा, मामले से जुड़े कथित पुलिस एनकाउंटर पर भी अदालत ने सवाल उठाए हैं और संकेत दिया है कि जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए मामले को विशेष जांच टीम (SIT) या किसी केंद्रीय एजेंसी को सौंपा जा सकता है।

यह याचिका पीड़ित बच्ची के पिता द्वारा दायर की गई थी, जो एक दिहाड़ी मजदूर हैं और न्याय की मांग कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और हर चरण पर जवाबदेही जरूरी है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी न सिर्फ इस मामले बल्कि ऐसे सभी मामलों में जांच के मानकों पर असर डाल सकती है, जहां शुरुआती प्रतिक्रिया और सबूतों की हैंडलिंग अहम भूमिका निभाती है।

फिलहाल पूरा मामला न्यायिक निगरानी में है और 13 अप्रैल की सुनवाई को बेहद अहम माना जा रहा है, जब वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को अपने फैसलों और जांच प्रक्रिया का जवाब देना होगा।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर बाल सुरक्षा, पुलिस जवाबदेही और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिन पर अब देशभर में चर्चा तेज हो गई है।

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