रायबरेली: बैंकिंग सिस्टम को चकमा देकर करोड़ों रुपये का लोन हासिल करने वाले एक संगठित गिरोह का बड़ा खुलासा करते हुए पुलिस ने ₹9 करोड़ के लोन फर्जीवाड़ा मामले में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह मामला बैंक ऑफ बड़ौदा की मुख्य शाखा से जुड़ा है, जहां जाली दस्तावेजों के आधार पर बड़ी संख्या में लोन स्वीकृत कराए गए थे। शुरुआती जांच में कुल 53 आरोपियों की पहचान हुई है, जिनमें बैंक कर्मियों की संलिप्तता भी सामने आई है।
गिरफ्तार किए गए आरोपियों में राजेश सिंह, बबलू राठौर, कामिनी राठौर, गोपाल सिंह और राधिका देवी शामिल हैं। इनमें दो महिलाएं भी हैं। सभी आरोपी उन्नाव, सीतापुर और लखनऊ के अलग-अलग इलाकों के निवासी बताए जा रहे हैं। पुलिस ने इन सभी को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है।
जांच में सामने आया है कि आरोपियों ने सुनियोजित तरीके से जाली वेतन प्रमाणपत्र और अन्य फर्जी दस्तावेज तैयार कर बैंक से लोन हासिल किया। इन दस्तावेजों के जरिए यह दर्शाया गया कि आवेदक नियमित आय वाले कर्मचारी हैं और लोन चुकाने में सक्षम हैं। इसी आधार पर बैंक से भारी-भरकम लोन पास कराए गए, जिससे बैंक को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इस पूरे फर्जीवाड़े में बैंक के कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत भी सामने आई है। बिना उनकी सहायता के इतनी बड़ी संख्या में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लोन स्वीकृत होना संभव नहीं माना जा रहा। जांच एजेंसियां अब बैंक कर्मियों की भूमिका की गहराई से जांच कर रही हैं और इस संबंध में आगे और कार्रवाई की तैयारी है।
इस घोटाले का खुलासा तब हुआ जब बैंक के मुख्य प्रबंधक ने 29 दिसंबर 2025 को सदर कोतवाली में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में 48 संदिग्ध आवेदकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इसके बाद पुलिस ने एक विशेष जांच टीम गठित कर मामले की विस्तृत जांच शुरू की।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी अलग-अलग जिलों से मिलकर एक नेटवर्क के रूप में काम कर रहे थे। वे पहले फर्जी पहचान और दस्तावेज तैयार करते थे, फिर बैंक में आवेदन कर लोन स्वीकृत कराते थे। इसके बाद लोन की राशि निकालकर आपस में बांट ली जाती थी। कई मामलों में यह आशंका भी जताई जा रही है कि इस रकम का इस्तेमाल अन्य अवैध गतिविधियों में किया गया।
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पुलिस का कहना है कि गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में कई महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं, जिनके आधार पर अन्य फरार आरोपियों की तलाश की जा रही है। अब तक 53 लोगों की संलिप्तता सामने आ चुकी है, जिनमें से अधिकांश अभी गिरफ्त से बाहर हैं। उनकी गिरफ्तारी के लिए कई टीमों को लगाया गया है।
इस पूरे मामले ने बैंकिंग प्रणाली की सुरक्षा और सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संगठित गिरोह बैंकिंग सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाते हैं और दस्तावेज सत्यापन में खामियों के चलते इस तरह के फर्जीवाड़े को अंजाम देते हैं।
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने इस मामले पर कहा, “आजकल वित्तीय अपराध केवल साइबर स्पेस तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ऑफलाइन और ऑनलाइन तरीकों का मिश्रण बन चुके हैं। जाली दस्तावेजों के जरिए लोन लेना और फिर रकम को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करना एक संगठित आर्थिक अपराध का संकेत है।”
उन्होंने आगे कहा कि ऐसे मामलों में अक्सर ‘म्यूल अकाउंट’ और फर्जी पहचान का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे असली मास्टरमाइंड तक पहुंचना कठिन हो जाता है। “बैंकों को अपने केवाईसी और बैकग्राउंड वेरिफिकेशन सिस्टम को और मजबूत करना होगा, ताकि इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके,” उन्होंने जोड़ा।
फिलहाल पुलिस इस पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए लगातार कार्रवाई कर रही है। अधिकारियों का दावा है कि जल्द ही फरार आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा और इस बड़े लोन घोटाले के पीछे की पूरी साजिश का पर्दाफाश किया जाएगा।
