लखनऊ: राजधानी लखनऊ में बड़े पैमाने पर फर्जी नंबरों का इस्तेमाल कर ट्रकों को टोल से पार कराने का मामला सामने आया है। शहर में सक्रिय एक रैकेट हर महीने लगभग 3200 ओवरलोड ट्रकों को फर्जी नंबरों के जरिए टोल पार करवा रहा है। इन ट्रकों का कोई रिकार्ड नहीं बन रहा और ओवरलोडिंग की प्रक्रिया बेरोकटोक जारी है।
सूत्रों के अनुसार, रैकेट में जुड़े लोग ट्रक पास करवाने वालों को ‘पासर’ कहते हैं। यह नेटवर्क गिट्टी, मौरंग, बालू समेत अन्य निर्माण सामग्री के ओवरलोड वाहनों को धड़ल्ले से टोल पार करवाने में सक्रिय है। सिंडिकेट ने फर्जी नंबरों की लिस्ट बनाई है और टोलकर्मियों को ये नंबर देकर वाहन पार करवा दिए जाते हैं।
टोल अधिकारियों का कहना है कि इन फर्जी नंबरों का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। एमए, 1सी, ओएडब्ल्यू, सीडीपीसी सहित विभिन्न कोड के आधार पर नंबर बनाकर टोलकर्मियों को प्रदान किए जाते हैं। जब सिंडिकेट से जुड़े ओवरलोड ट्रक टोल पर आते हैं, तो केवल इन नंबरों की एंट्री कर पर्ची काट दी जाती है।
सूत्रों के अनुसार, रैकेट ने 480 फर्जी नंबरों की लिस्ट तैयार कर रखी है। इनमें शामिल कुछ प्रमुख नंबर हैं: एमए24पीए2736, एमएटी54जे3087, एमबी1एयूजीसीसी4बीआरजीएल006, सीएलएमएम101469, 1सी63588694, एमएएलए6994बी5एच9874, 1एसएनएम821418, एलएएमएम060405, ओएनसीएन221310, ओएडब्ल्यूएसएक्स55238, सीडीपीसी429482, 57जे1जे28931, 21एच1सी07579।
विशेषज्ञ बताते हैं कि रैकेट व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए सक्रिय है। जब कोई ओवरलोड ट्रक टोल से गुजरता है, तो इसके रूट का अगला टोल भी तुरंत सूचना भेजकर तैयार हो जाता है। इससे पूरे नेटवर्क में ओवरलोडिंग को छुपाने की सुविधा मिलती है।
सिंडिकेट की यह गतिविधि केवल ट्रकों की फर्जी एंट्री तक सीमित नहीं है। इसमें टोलकर्मियों की मिलीभगत भी शामिल है, जिससे ओवरलोड वाहनों का नियंत्रण लगभग असंभव हो गया है। इससे सड़क सुरक्षा के साथ-साथ निर्माण सामग्री की सही ढंग से आवाजाही भी प्रभावित हो रही है।
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ट्रक मालिकों और पासर्स का नेटवर्क इतना संगठित है कि वे टोल से गुजरते ही व्हाट्सएप और अन्य डिजिटल माध्यमों से रूट की जानकारी साझा करते हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि हर ओवरलोड वाहन को टोल पार कराया जा सके।
परिवहन विभाग के अधिकारी रैकेट की गतिविधियों पर चिंता जताते हुए कहते हैं कि फर्जी नंबरों और टोल कर्मचारियों की मिलीभगत ने पूरे सिस्टम को कमजोर कर दिया है। अधिकारी अभी मामले की गहन जांच कर रहे हैं और ऐसे नंबरों पर रोक लगाने के लिए तकनीकी समाधान तलाश रहे हैं।
हालांकि, पिछले वर्ष ही एसटीएफ ने इस तरह के ओवरलोड वाहन रैकेट पर कार्रवाई की थी। सूत्र बताते हैं कि इसके बावजूद नेटवर्क सक्रिय है और ट्रकों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में प्रशासनिक सतर्कता, टोल पर निगरानी और डिजिटल रिकार्डिंग सिस्टम मजबूत करना सबसे प्रभावी उपाय हो सकते हैं। उन्होंने आगाह किया कि अगर समय रहते रोक नहीं लगी, तो सड़क दुर्घटनाओं और निर्माण सामग्री की आपूर्ति में अव्यवस्था बढ़ सकती है।
इस रैकेट के उजागर होने से स्पष्ट हो गया है कि फर्जी नंबर और ओवरलोडिंग पर अंकुश लगाने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक कार्रवाई दोनों की आवश्यकता है। विभाग जल्द ही समाधान निकालने और सिंडिकेट पर अंकुश लगाने की योजना बना रहा है।
