चंडीगढ़: साइबर ठगी के बढ़ते मामलों के बीच एक और चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहां पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट (PGI) के एक डॉक्टर को ऑनलाइन ट्रेडिंग के नाम पर ₹1.10 करोड़ की भारी ठगी का शिकार बनाया गया। यह मामला दिखाता है कि किस तरह संगठित साइबर गिरोह फर्जी निवेश प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के जरिए लोगों को जाल में फंसा रहे हैं।
पीड़ित डॉक्टर, जो न्यूरोसर्जरी विभाग में कार्यरत हैं, ने शिकायत में बताया कि उन्होंने दिसंबर 2025 में सोशल मीडिया के माध्यम से शेयर बाजार में निवेश की संभावनाएं तलाशनी शुरू की थीं। इसी दौरान जनवरी 2026 में उन्हें एक WhatsApp ग्रुप में जोड़ा गया, जिसका नाम “Po8-5 Paisa Wealth Horizon” बताया गया। इस ग्रुप में करीब 250 सदस्य मौजूद थे और इसे कथित तौर पर निवेश सलाहकारों द्वारा संचालित किया जा रहा था।
छोटे निवेश से शुरू हुआ भरोसे का खेल
शुरुआत में डॉक्टर को एक मोबाइल ऐप “5-P” के जरिए ट्रेडिंग करने के लिए कहा गया। 5 फरवरी को उन्होंने ₹10,000 का पहला निवेश किया। कुछ ही समय में ऐप के डैशबोर्ड पर मुनाफा दिखाया गया, जिससे उनका भरोसा बढ़ गया।
इसके बाद ग्रुप में मौजूद तथाकथित “कोऑर्डिनेटर” और “टीम लीडर” ने उन्हें बड़े निवेश के लिए प्रेरित किया। उन्हें “डेली रिटर्न” और IPO ट्रेडिंग योजनाओं का लालच दिया गया, जिसमें रोज़ाना 5% तक मुनाफे का दावा किया गया।
25 ट्रांजेक्शन में ₹1.10 करोड़ ट्रांसफर
लालच और भरोसे के इस खेल में फंसकर डॉक्टर ने अगले दो महीनों में कुल ₹1.10 करोड़ की रकम 25 अलग-अलग ट्रांजेक्शन के जरिए ट्रांसफर कर दी। इन ट्रांजेक्शन में UPI, IMPS, RTGS और NEFT जैसे विभिन्न बैंकिंग माध्यमों का इस्तेमाल किया गया।
मार्च के अंत तक ऐप पर उनके खाते में ₹4.73 करोड़ का बैलेंस दिखाया जा रहा था, जिसमें ₹4.15 करोड़ का कथित मुनाफा शामिल था। लेकिन यह पूरा आंकड़ा फर्जी था और सिर्फ पीड़ित को भ्रमित करने के लिए दिखाया गया था।
निकासी के नाम पर शुरू हुआ दूसरा चरण
23 मार्च को जब डॉक्टर ने अपने पैसे निकालने की कोशिश की, तो ठगों ने उनसे ₹41.59 लाख “ब्रोकरेज चार्ज” के रूप में जमा करने को कहा। शुरुआत में संदेह होने के बावजूद, ग्रुप में मौजूद अन्य लोगों के फर्जी दावों से प्रभावित होकर उन्होंने यह रकम भी ट्रांसफर कर दी।
इसके बाद ठगों ने एक और मांग रखी—₹10 लाख “सिक्योरिटी डिपॉजिट” के नाम पर, यह दावा करते हुए कि यह रकम भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के निर्देश के तहत जरूरी है, क्योंकि खाते में “मनी लॉन्ड्रिंग” की आशंका है।
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फर्जीवाड़े का खुलासा और शिकायत
लगातार बढ़ती मांग और पैसे वापस न मिलने पर डॉक्टर को ठगी का एहसास हुआ। इसके बाद उन्होंने साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई। मामले में 3 अप्रैल को जीरो FIR दर्ज की गई और जांच शुरू कर दी गई है।
जांच में सामने आया है कि आरोपियों ने कई भारतीय और अंतरराष्ट्रीय नंबरों का इस्तेमाल कर WhatsApp के जरिए संपर्क बनाए रखा था, जिससे उनकी पहचान छिपी रहे।
सोशल इंजीनियरिंग का खतरनाक जाल
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला “सोशल इंजीनियरिंग” का एक क्लासिक उदाहरण है, जहां तकनीकी हैकिंग के बजाय लोगों के भरोसे, लालच और मनोविज्ञान का फायदा उठाया जाता है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “आजकल साइबर ठग सीधे सिस्टम को हैक करने के बजाय लोगों को मानसिक रूप से प्रभावित करते हैं। फर्जी ऐप, WhatsApp ग्रुप और नकली मुनाफे का खेल एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा होता है।”
सावधानी ही बचाव का सबसे बड़ा तरीका
यह मामला एक बार फिर यह साबित करता है कि ऑनलाइन निवेश के नाम पर मिलने वाले असामान्य रिटर्न के ऑफर से सतर्क रहना बेहद जरूरी है। किसी भी अनजान ऐप, लिंक या ग्रुप पर भरोसा करने से पहले उसकी सत्यता जांचना जरूरी है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि निवेश केवल अधिकृत और विश्वसनीय प्लेटफॉर्म के जरिए ही किया जाए और किसी भी प्रकार के “गारंटीड रिटर्न” के दावे को तुरंत संदेह की नजर से देखा जाए।
चंडीगढ़ में सामने आया यह मामला इस बात का संकेत है कि साइबर अपराध अब अधिक संगठित और जटिल हो चुके हैं, जहां ठग तकनीक के साथ-साथ इंसानी व्यवहार का भी पूरा फायदा उठा रहे हैं।
