चीनी कैमरों के सुरक्षा जोखिमों के बीच शीर्ष न्यायालय ने निगरानी और पारदर्शिता पर सख्त रुख अपनाया

पुलिस थानों में CCTV की सुरक्षा: सुप्रीम कोर्ट ने गृह सचिव को हाजिरी के लिए तलब किया

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस थानों में चल रही CCTV इंस्टॉलेशन परियोजना की समीक्षा के लिए केंद्र सरकार के गृह सचिव को मंगलवार को हाजिरी के लिए तलब किया है। न्यायालय ने इस योजना के क्रियान्वयन पर कड़ी निगरानी रखने की आवश्यकता जताई है ताकि सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।

न्यायाधीश विक्रम नाथ और संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह आदेश सुवो मोतु केस की सुनवाई के दौरान दिया, जो पुलिस थानों में कार्यात्मक CCTV सिस्टम की कमी से संबंधित था। सुनवाई के दौरान मीडिया रिपोर्टों पर चर्चा हुई कि कुछ चीनी निर्मित कैमरों को सुरक्षा चिंताओं के चलते हटाया गया, क्योंकि ऐसी जानकारी मिली थी कि ये कैमरे डेटा विदेशों में भेज रहे थे। खंडपीठ ने यह भी पूछा कि केरल जैसे अन्य राज्यों में सफल मॉडलों को अपनाने में क्या बाधा है।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने न्यायालय को बताया कि अब तक कैमरों को हटाने का कोई औपचारिक आदेश नहीं दिया गया है। खंडपीठ ने पिछले बैठकों में निचले स्तर के अधिकारियों के भाग लेने पर भी असंतोष व्यक्त किया और कहा कि योजना के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति आवश्यक है। इसी कारण गृह सचिव की हाजिरी जरूरी कर दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार 2018 में पुलिस थानों में CCTV लगाने का निर्देश दिया था, जिसका उद्देश्य मानवाधिकार उल्लंघनों को रोकना और निगरानी को प्रभावी बनाना था। इसके बाद 2020 में इस निर्देश को जांच एजेंसियों जैसे CBI, ED और NIA के कार्यालयों तक विस्तारित किया गया। इन कैमरों में ऑडियो-वीज़ुअल रिकॉर्डिंग, नाइट विज़न, और एक साल तक डेटा स्टोर करने की क्षमता होनी चाहिए।

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केंद्र और राज्य सरकारों ने इस परियोजना के लिए फंडिंग साझा की है, जिसमें केंद्र परियोजना लागत का लगभग 60% वहन करता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि परियोजना की सफलता के लिए राज्यों और केंद्रीय एजेंसियों को मिलकर काम करना होगा और तकनीकी सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करना होगा।

विशेषज्ञों ने बताया कि CCTV की कमी के कारण कई मामलों में जांच और मानवाधिकार संरक्षण प्रभावित हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि कैमरे केवल लगे ही नहीं होने चाहिए, बल्कि सक्रिय रूप से निगरानी और रिकॉर्डिंग के लिए कार्यरत भी होने चाहिए।

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि योजना के क्रियान्वयन में देरी और कमजोर निगरानी गंभीर सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकती है। न्यायालय ने गृह सचिव से अपेक्षा जताई कि वे योजना के त्वरित कार्यान्वयन, तकनीकी सुरक्षा, और नियमित निगरानी सुनिश्चित करने में सक्रिय भूमिका निभाएँ।

इस कदम को देशभर में पुलिस थानों और जांच एजेंसियों में डिजिटल सुरक्षा और मानवाधिकार सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश भी दिया कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

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