“तेज डिजिटल पेमेंट सिस्टम बना नया निशाना; फर्जी पहचान, म्यूल अकाउंट और हाई-वैल्यू स्कैम से बढ़ा खतरा, ₹22,931 करोड़ का नुकसान”

‘कोषागार घोटाले में शिकंजा’: चित्रकूट में दो सगे भाई गिरफ्तार, ₹40 लाख के अनियमित भुगतान में भूमिका

Roopa
By Roopa
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चित्रकूट: कोषागार से जुड़े बहुचर्चित घोटाले में जांच एजेंसियों को बड़ी सफलता मिली है। विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने इस मामले में बिचौलियों की भूमिका निभाने वाले दो सगे भाइयों—हिमांशू सिंह और प्रियांशू सिंह—को गिरफ्तार कर लिया है। दोनों पर आरोप है कि उन्होंने कई पेंशनरों को अपने जाल में फंसाकर कोषागार कर्मियों की कथित मिलीभगत से करीब ₹चालीस लाख का अनियमित भुगतान करवाया।

यह कार्रवाई उस बड़े घोटाले की जांच के दौरान हुई है, जिसमें कोषागार से कुल ₹43.13 करोड़ के संदिग्ध और अनियमित भुगतान का मामला सामने आया था। इस प्रकरण में सत्रह अक्टूबर दो हजार पच्चीस को वरिष्ठ कोषाधिकारी की ओर से तिरानवे नामजद पेंशनरों और चार कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया था। इसके बाद से ही पूरे मामले की जांच एसआईटी द्वारा की जा रही है, जिसमें लगातार नए तथ्य सामने आ रहे हैं।

जांच के दौरान यह बात उजागर हुई कि आरोपी भाइयों ने पेंशनरों को विभिन्न तरीकों से प्रभावित कर अपने जाल में फंसाया। उन्हें अधिक पेंशन या अतिरिक्त लाभ दिलाने का लालच दिया गया। आरोप है कि इस प्रक्रिया में उन्होंने विभाग के कुछ कर्मियों के साथ मिलकर दस्तावेजों और भुगतान प्रणाली में हेरफेर करवाई। इस तरह सरकारी धन को नियमों के विरुद्ध निकालकर बांटा गया।

सूत्रों के अनुसार, दोनों आरोपी लंबे समय से इस तरह की गतिविधियों में सक्रिय हो सकते हैं और इनके तार एक बड़े नेटवर्क से जुड़े होने की आशंका भी जताई जा रही है। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह मामला केवल सीमित स्तर का नहीं, बल्कि एक संगठित तंत्र का हिस्सा है, जिसमें कई स्तरों पर मिलीभगत की संभावना है।

एसआईटी ने तकनीकी साक्ष्यों, बैंक रिकॉर्ड, दस्तावेजों और गवाहों के बयानों के आधार पर दोनों भाइयों की भूमिका की पुष्टि की। इसके बाद टीम ने योजनाबद्ध तरीके से कार्रवाई करते हुए घेराबंदी कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।

इस घोटाले की जांच में अब तक कई चौंकाने वाले पहलू सामने आ चुके हैं। शुरुआती जांच में यह संकेत मिले हैं कि पेंशन भुगतान प्रणाली में मौजूद खामियों का फायदा उठाकर बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई। फर्जी दस्तावेज, गलत प्रविष्टियां और सिस्टम की कमजोरियों का इस्तेमाल कर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया।

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विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में बिचौलियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, जो आम लोगों को लालच या भ्रम में डालकर सिस्टम का दुरुपयोग करवाते हैं। यदि समय पर निगरानी और सत्यापन मजबूत न हो, तो इस तरह की अनियमितताएं बड़े घोटालों का रूप ले सकती हैं।

जांच एजेंसियां अब इस बात का पता लगाने में जुटी हैं कि इस पूरे नेटवर्क में और कौन-कौन शामिल है। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि जिन पेंशनरों के नाम पर भुगतान हुआ, वे वास्तव में इस धोखाधड़ी में शामिल थे या उन्हें गुमराह कर इस्तेमाल किया गया।

अधिकारियों के अनुसार, मामले की तह तक पहुंचने के लिए वित्तीय लेन-देन, बैंक खातों और संबंधित दस्तावेजों की गहन जांच की जा रही है। जरूरत पड़ने पर अन्य माध्यमों से भी जानकारी जुटाई जाएगी, ताकि पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश किया जा सके।

यह मामला न केवल सरकारी धन के दुरुपयोग का है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि यदि निगरानी तंत्र कमजोर हो, तो किस तरह संगठित तरीके से वित्तीय अनियमितताएं की जा सकती हैं।

फिलहाल, दोनों आरोपियों की गिरफ्तारी को जांच में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, इस घोटाले से जुड़े और भी बड़े खुलासे सामने आने की संभावना जताई जा रही है, जो पूरे मामले की गंभीरता को और उजागर कर सकते हैं।

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