नई दिल्ली: वाहन सुरक्षा को लेकर एक अहम फैसले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी कार में मौजूद सुरक्षा उपकरण समय पर काम नहीं करते, तो इसे गंभीर निर्माण दोष माना जाएगा। नौ साल तक चले कानूनी संघर्ष के बाद आयोग ने कार निर्माता कंपनी और डीलर को वाहन की पूरी कीमत ₹10.42 लाख लौटाने का आदेश बरकरार रखा है।
यह मामला एक Ford EcoSport कार से जुड़ा है, जिसे 2015 में खरीदा गया था। शिकायतकर्ता योगेश जैन ने अमृतसर में डीलर के जरिए यह वाहन खरीदा था। कार पर कंपनी की वारंटी भी लागू थी और वाहन पूरी तरह बीमित था। लेकिन खरीद के एक साल के भीतर ही यह कार एक गंभीर सड़क दुर्घटना का शिकार हो गई।
रिकॉर्ड के अनुसार, 27 मई 2016 को पठानकोट-अमृतसर एक्सप्रेसवे पर कार डिवाइडर से टकराई, पलटी खाई और सड़क के दूसरी ओर जा गिरी। इस हादसे में चालक को सिर, गर्दन और हाथों में चोटें आईं। हालांकि कार में छह एयरबैग मौजूद थे, लेकिन दुर्घटना के दौरान केवल दो एयरबैग ही खुले, जबकि बाकी चार एयरबैग काम नहीं कर पाए।
यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु बना। शिकायतकर्ता का आरोप था कि इतनी गंभीर दुर्घटना में चार एयरबैग का न खुलना एक स्पष्ट मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट है, जिसने जान का खतरा बढ़ा दिया। इस आधार पर उन्होंने उपभोक्ता फोरम का रुख किया।
जिला उपभोक्ता आयोग ने मार्च 2017 में अपने फैसले में माना कि यह “मेजर इनहेरेंट डिफेक्ट” का मामला है और कंपनी तथा डीलर को संयुक्त रूप से वाहन की पूरी कीमत लौटाने का निर्देश दिया। साथ ही ₹20,000 मुआवजा और ₹5,000 वाद व्यय देने का आदेश भी दिया गया। यदि भुगतान में देरी होती है तो 9% वार्षिक ब्याज भी लागू करने को कहा गया।
इसके खिलाफ कंपनी और डीलर ने राज्य आयोग में अपील की, लेकिन जुलाई 2017 में वहां भी जिला आयोग के फैसले को सही ठहराया गया। इसके बाद मामला NCDRC पहुंचा, जहां कंपनी ने तर्क दिया कि एयरबैग हर स्थिति में नहीं खुलते और इसके लिए तकनीकी परीक्षण (लैब टेस्ट) जरूरी है।
हालांकि, आयोग ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। अपने विस्तृत फैसले में NCDRC ने कहा कि एयरबैग वाहन की सुरक्षा प्रणाली का अहम हिस्सा हैं, जो दुर्घटना के दौरान मिलीसेकंड में खुलकर यात्रियों की जान बचाते हैं। यदि गंभीर हादसे में वे काम नहीं करते, तो यह खुद में ही दोष साबित करने के लिए पर्याप्त है।
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आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि हर मामले में विशेषज्ञ या लैब रिपोर्ट जरूरी नहीं होती, खासकर तब जब दोष स्पष्ट और निर्विवाद हो। इस संदर्भ में ‘रेस इप्सा लोकीटर’ (Res Ipsa Loquitur) सिद्धांत लागू किया गया, जिसका अर्थ है—“घटना खुद अपनी कहानी कहती है।”
कंपनी ने यह भी दलील दी कि एयरबैग केवल विशेष प्रकार के टक्कर में ही सक्रिय होते हैं और सीट बेल्ट के उपयोग से भी उनका संबंध होता है। लेकिन आयोग ने कहा कि एयरबैग और सीट बेल्ट दो अलग-अलग सुरक्षा प्रणालियां हैं और एक की विफलता को दूसरे के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
आयोग ने यह भी पाया कि दुर्घटना के बाद वाहन लंबे समय तक डीलर के पास रहा, लेकिन समस्या का समाधान नहीं किया गया। शिकायतकर्ता की ओर से दिए गए साक्ष्य का प्रभावी खंडन भी नहीं किया गया, जिससे मामला और मजबूत हो गया।
अंततः NCDRC ने यह निष्कर्ष निकाला कि निचली दोनों उपभोक्ता अदालतों के फैसले तथ्यों और कानून के अनुरूप हैं। किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि या प्रक्रिया में कमी नहीं पाई गई, इसलिए हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। परिणामस्वरूप, कंपनी और डीलर की याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
यह फैसला उपभोक्ता अधिकारों और ऑटोमोबाइल सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि वाहन निर्माता कंपनियां सुरक्षा मानकों से समझौता नहीं कर सकतीं और तकनीकी दलीलों के पीछे छिपकर जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मिसाल बनेगा, जहां सुरक्षा उपकरणों की विफलता सामने आती है। यह उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने और न्याय पाने के लिए आगे आने के लिए भी प्रेरित करेगा।
