फर्जी FDR, शेल कंपनियों और कैश ट्रांजैक्शन के जरिए फंड साइफनिंग का आरोप; पूर्व CFO समेत कई पर जांच तेज

₹95.78 करोड़ की जगह खाते में मिले सिर्फ ₹81.20: चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में करोड़ों की हेराफेरी का खुलासा

Roopa
By Roopa
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चंडीगढ़: शहर के स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से जुड़े एक बड़े वित्तीय घोटाले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले में खुलासा हुआ है कि जहां ₹95.78 करोड़ की राशि नगर निगम के खाते में ट्रांसफर होनी थी, वहां सिर्फ ₹81.20 ही पाए गए। इस चौंकाने वाले अंतर ने करोड़ों रुपये की कथित हेराफेरी की परतें खोल दी हैं।

जांच एजेंसियों ने इस मामले में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की पूर्व मुख्य वित्त अधिकारी (CFO) नलिनी मलिक को केंद्र में रखा है। अदालत में पेश किए गए रिमांड नोट में कहा गया है कि पूरे षड्यंत्र को समझने, गायब रकम का पता लगाने और अन्य आरोपियों की भूमिका स्पष्ट करने के लिए उनकी कस्टोडियल पूछताछ जरूरी है। अदालत ने फिलहाल चार दिन की पुलिस रिमांड मंजूर की है।

मामले की शुरुआत तब हुई जब Chandigarh स्मार्ट सिटी लिमिटेड (CSCL) का विलय नगर निगम में किया गया। 28 मार्च 2025 को इस प्रक्रिया के तहत एक नया बैंक खाता खोला गया, जिसमें प्रोजेक्ट से जुड़ी राशि ट्रांसफर होनी थी। लेकिन चार्ज हैंडओवर के समय खाते में महज ₹81.20 ही मौजूद थे, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार ₹95.78 करोड़ जमा होने थे।

जांच में सामने आया है कि इस पूरी रकम को कथित तौर पर सुनियोजित तरीके से विभिन्न खातों में डायवर्ट किया गया। आरोप है कि नलिनी मलिक ने अन्य अधिकारियों और बैंक से जुड़े लोगों के साथ मिलकर 11 फर्जी फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें (FDR) तैयार कीं, जिनकी कुल राशि ₹116.84 करोड़ बताई गई। इन फर्जी दस्तावेजों के जरिए वास्तविक लेन-देन को छिपाने की कोशिश की गई।

जांच एजेंसियों का दावा है कि यह रकम कई शेल कंपनियों के खातों में ट्रांसफर की गई, जिनमें CAPCO Fintech, R S Traders और Swastik Desh Project जैसी इकाइयों के नाम सामने आए हैं। इन कंपनियों का इस्तेमाल फंड को छुपाने और बाद में कैश में निकालने के लिए किया गया।

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रिमांड नोट के अनुसार, आरोपियों ने इस फंड का एक बड़ा हिस्सा नकद रूप में भी निकाला। जांच में यह भी सामने आया है कि कथित रूप से ₹50 करोड़ से ज्यादा की राशि कैश के रूप में संबंधित लोगों तक पहुंचाई गई। इस दौरान बैंकिंग सिस्टम और रिकॉर्ड में हेरफेर कर ट्रांजैक्शन को वैध दिखाने की कोशिश की गई।

मामले में एक अन्य अहम आरोपी, पूर्व बैंक मैनेजर रिशव ऋषि का नाम भी सामने आया है। पूछताछ में उसने कथित तौर पर स्वीकार किया कि फर्जी FDR बनाने में उसकी भूमिका थी और यह काम नगर निगम व स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों के साथ मिलकर किया गया। उसने यह भी बताया कि शेल कंपनियां पहले से योजना बनाकर बनाई गई थीं, ताकि पैसे को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किया जा सके।

जांच एजेंसियों ने यह भी बताया कि एक आउटसोर्स्ड अकाउंटेंट, अनुभव मिश्रा, इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण कड़ी हो सकता है। वह फरवरी से लापता बताया जा रहा है और उसका मोबाइल फोन भी बंद है। अधिकारियों को आशंका है कि उसके पास कई अहम दस्तावेज और जानकारी हो सकती है, जिससे पूरे नेटवर्क का खुलासा हो सकता है।

प्रारंभिक जांच से यह संकेत मिल रहे हैं कि यह कोई एकल व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि कई स्तरों पर फैला एक संगठित वित्तीय घोटाला है, जिसमें सरकारी और बैंकिंग सिस्टम की खामियों का फायदा उठाया गया।

अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं, क्योंकि मामले की जांच लगातार आगे बढ़ रही है। साथ ही, गायब रकम को ट्रेस करने के लिए बैंक खातों, डिजिटल ट्रांजैक्शन और संपत्तियों की भी जांच की जा रही है।

यह मामला न केवल वित्तीय अनियमितताओं का बड़ा उदाहरण है, बल्कि यह भी दिखाता है कि बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स में पारदर्शिता और निगरानी कितनी जरूरी है।

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