चंडीगढ़/पंचकूला: हरियाणा के पंचकूला में सामने आए बहुचर्चित बैंक और फिक्स्ड डिपॉजिट (FDR) घोटाले में जांच एजेंसियों को बड़ी सफलता मिली है। इस मामले में पहली बार एक सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी हुई है, जिसने पूरे घोटाले की परतें और गहरी कर दी हैं। नगर निगम में तैनात सेक्शन ऑफिसर विकास कौशिक को करोड़ों रुपये के इस वित्तीय घोटाले में मुख्य आरोपी के रूप में गिरफ्तार किया गया है।
जांच में खुलासा हुआ है कि आरोपी ने बैंक के एक मैनेजर के साथ मिलकर फर्जी बैंक खाते खोलकर और नकली दस्तावेज तैयार कर सरकारी फंड में बड़ी हेराफेरी को अंजाम दिया। यह मामला न केवल वित्तीय अनियमितताओं का उदाहरण है, बल्कि सरकारी सिस्टम में मौजूद खामियों को भी उजागर करता है।
मामले की जांच कर रही एजेंसी के अनुसार, विकास कौशिक ने वर्ष 2020 में नगर निगम के नाम पर एक फर्जी बैंक खाता खुलवाया। इस खाते को खोलने के लिए उसने वरिष्ठ अधिकारियों की मुहरों का इस्तेमाल किया, जबकि उनके हस्ताक्षर बैंक मैनेजर द्वारा फर्जी तरीके से बनाए गए। इसके बाद 2022 में इसी तरह एक और फर्जी खाता खोला गया, जिसमें भी नकली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया।
जांच में सामने आया है कि आरोपियों ने RTGS और NEFT जैसे बैंकिंग माध्यमों के जरिए फर्जी डेबिट नोट तैयार किए। इन दस्तावेजों में विकास कौशिक ने खुद को अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के रूप में दर्शाया, जबकि दूसरे हस्ताक्षर भी जालसाजी से किए गए। इन फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नगर निगम के खातों से रकम निकालकर अन्य खातों में ट्रांसफर की गई।
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि आरोपियों ने नगर निगम की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) को समय से पहले तोड़कर रकम को अपने नियंत्रण वाले खातों में ट्रांसफर कर दिया। इसके बाद इस पैसे को एजेंटों, रिश्तेदारों और बिल्डरों के खातों में भेजा गया, जिससे फंड का ट्रैक करना मुश्किल हो जाए।
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जब 2025 और 2026 में नगर निगम ने अपने खातों और FD की जानकारी मांगी, तब तक सभी रकम निकाली जा चुकी थी। आरोपियों ने इस घोटाले को छुपाने के लिए नकली बैंक स्टेटमेंट और फर्जी FD दस्तावेज तैयार कर अधिकारियों को सौंप दिए, जिससे लंबे समय तक यह हेराफेरी छिपी रही।
जांच एजेंसियों ने बताया कि इस पूरे घोटाले में बैंक के एक रिलेशनशिप मैनेजर सहित कई अन्य लोगों की भी भूमिका सामने आई है। अब तक इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि अन्य संदिग्धों की तलाश जारी है।
अधिकारियों का कहना है कि विकास कौशिक को अदालत में पेश कर रिमांड पर लिया जाएगा, ताकि उससे पूछताछ कर पूरे नेटवर्क का खुलासा किया जा सके। जांच में यह भी पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस घोटाले में और कौन-कौन लोग शामिल थे और कुल कितनी रकम का गबन हुआ।
प्रारंभिक जांच से संकेत मिलते हैं कि यह एक संगठित साजिश थी, जिसमें सरकारी कर्मचारी और बैंक अधिकारी मिलकर काम कर रहे थे। फर्जी दस्तावेज, शेल अकाउंट और डिजिटल ट्रांजैक्शन के जरिए इस घोटाले को अंजाम दिया गया।
यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि सरकारी संस्थानों में वित्तीय लेन-देन की निगरानी कितनी कमजोर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ऑडिट और वेरिफिकेशन की प्रक्रिया मजबूत होती, तो इस तरह के घोटालों को रोका जा सकता था।
फिलहाल जांच एजेंसियां पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही हैं और आने वाले दिनों में और खुलासों की संभावना जताई जा रही है। यह घोटाला प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को एक बार फिर उजागर करता है।
