बेंगलुरु: देश के कई बड़े शहरों में कथित तौर पर करोड़ों रुपये की ठगी करने वाले तीन आरोपियों को राहत देने से Karnataka High Court ने साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज 11 अलग-अलग आपराधिक मामलों को रद्द करने की मांग खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस स्तर पर जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
यह मामला एक संगठित फर्जीवाड़े से जुड़ा है, जिसमें आरोप है कि आरोपियों ने ‘लोन दिलाने’ के नाम पर जरूरतमंद लोगों को निशाना बनाया और उनसे बड़ी रकम ऐंठ ली। जिन तीन लोगों पर यह आरोप हैं, उनमें Roshan Saldanha, उनकी पत्नी Dafney Neethu D’Souza और N Chandrashekhar शामिल हैं।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला अभी जांच के शुरुआती चरण में है और इस समय प्राथमिकी (FIR) को रद्द करना कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ होगा। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि FIR किसी अपराध का अंतिम निष्कर्ष नहीं होती, बल्कि यह जांच की शुरुआत होती है, और ऐसे मामलों में जांच पूरी तरह से आगे बढ़नी चाहिए।
मामले के अनुसार, आरोपियों का काम करने का तरीका (मोडस ऑपरेंडी) एक जैसा था। वे ऐसे लोगों की पहचान करते थे जिन्हें तत्काल धन की आवश्यकता होती थी। इसके बाद वे खुद को वित्तीय समाधान उपलब्ध कराने वाले के रूप में पेश करते और दावा करते कि वे उनके खातों में बड़ी राशि ट्रांसफर करवा सकते हैं।
शिकायतों में यह भी आरोप है कि इस पूरे नेटवर्क में कई फर्जी कंपनियों का इस्तेमाल किया गया। इन कंपनियों के जरिए लेनदेन को वैध दिखाने की कोशिश की गई, जबकि वास्तविकता में यह एक सुनियोजित ठगी का जाल था।
इस मामले की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि अलग-अलग राज्यों और शहरों के लोगों ने शिकायत दर्ज कराई है। मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और केरल समेत कई स्थानों के पीड़ितों ने आरोप लगाया है कि उन्हें झांसे में लेकर बड़ी रकम ठगी गई।
FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल एक शिकायत या एक लेनदेन का मामला नहीं है, बल्कि 11 अलग-अलग शिकायतें हैं, जिनमें अलग-अलग पीड़ित शामिल हैं, लेकिन आरोपियों का पैटर्न एक जैसा है। ऐसे में इसे महज ‘सिविल विवाद’ बताकर खारिज करने का तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से यह दलील दी गई कि यह मामला सिविल प्रकृति का है और उनके खिलाफ दर्ज मामलों का आपराधिक स्वरूप नहीं बनता। साथ ही यह भी कहा गया कि जिन खातों में पैसे जमा हुए, उनका आरोपियों से सीधा संबंध नहीं है।
हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि यह सभी तथ्य जांच का हिस्सा हैं और इन्हें जांच एजेंसियों द्वारा परखा जाना जरूरी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कई पीड़ितों द्वारा समान आरोप लगाए गए हैं, तो ऐसे मामलों में जांच को रोकना न्यायहित में नहीं होगा।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि आरोपियों पर लोगों को झांसा देकर आर्थिक नुकसान पहुंचाने के गंभीर आरोप हैं, इसलिए जांच प्रक्रिया को बाधित करना उचित नहीं होगा।
इस फैसले के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि आरोपियों को फिलहाल किसी भी प्रकार की राहत नहीं मिलेगी और उन्हें जांच का सामना करना होगा। आने वाले समय में जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलने में जुटेंगी, जिससे यह पता लगाया जा सके कि कितने लोगों को इस ठगी का शिकार बनाया गया और कितनी रकम का लेनदेन हुआ।
यह मामला एक बार फिर इस बात को उजागर करता है कि किस तरह फर्जी वित्तीय सेवाओं और ‘आसान लोन’ के नाम पर लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। अदालत का यह सख्त रुख ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों को मजबूत आधार देता है और यह संदेश भी देता है कि बहु-राज्यीय आर्थिक अपराधों में शुरुआती स्तर पर राहत पाना आसान नहीं होगा।
