मुंबई: साइबर ठगी के बदलते तौर-तरीकों के बीच मुंबई में एक अनोखी पहल सामने आई है, जहां साइबर टीमें अब अपराध होने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले ही लोगों को सतर्क करने के लिए घर-घर दस्तक दे रही हैं। खासतौर पर उन वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है जो अकेले रहते हैं और “डिजिटल अरेस्ट” जैसे नए साइबर जाल में फंसने का ज्यादा खतरा रखते हैं।
जानकारी के मुताबिक, पिछले चार महीनों में साइबर टीमों ने शहरभर में लगभग तीन हजार पांच सौ से अधिक ऐसे बुजुर्गों तक पहुंच बनाई है, जो अकेले रहते हैं। इस अभियान का मकसद उन्हें यह समझाना है कि “डिजिटल अरेस्ट” नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं होती और यह सिर्फ ठगों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक मनोवैज्ञानिक हथकंडा है।
आंकड़े बताते हैं कि बीते वर्ष मुंबई में इस तरह के करीब एक सौ इक्यानवे मामले दर्ज हुए थे, जिनमें सौ करोड़ रुपये से अधिक की ठगी हुई। वर्ष दो हजार चौबीस में भी एक सौ तिरानवे मामले सामने आए, जबकि इस वर्ष फरवरी तक ही सत्ताईस केस दर्ज हो चुके हैं। इन मामलों में ज्यादातर पीड़ित अकेले रहने वाले बुजुर्ग रहे, जिन्हें वीडियो कॉल के जरिए खुद को जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर डराया गया।
इस खतरे को देखते हुए साइबर टीमें अब सक्रिय रूप से लोगों के घर पहुंच रही हैं। करीब चालीस कर्मियों को बीस टीमों में बांटा गया है, जो शनिवार को विशेष रूप से दौरे करती हैं, ताकि अधिकतर लोग घर पर मिल सकें। टीमें सुबह और शाम के समय विजिट करती हैं, जिससे बुजुर्गों को असुविधा न हो।
इन मुलाकातों के दौरान टीम के सदस्य विस्तार से समझाते हैं कि कोई भी एजेंसी वीडियो कॉल पर “डिजिटल अरेस्ट” नहीं करती। यदि कोई व्यक्ति खुद को किसी केंद्रीय जांच एजेंसी या पुलिस अधिकारी बताकर डराने की कोशिश करे, तो तुरंत कॉल काट देना चाहिए। साथ ही किसी भी तरह की निजी या बैंकिंग जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए।
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टीमें नागरिकों को आपात स्थिति में तुरंत मदद लेने के तरीके भी बताती हैं। उन्हें स्थानीय पुलिस हेल्पलाइन और साइबर हेल्पलाइन नंबर की जानकारी दी जाती है, ताकि किसी भी संदिग्ध स्थिति में तुरंत शिकायत दर्ज कराई जा सके। इसके अलावा, जागरूकता बढ़ाने के लिए टीमों द्वारा बुजुर्गों के साथ छोटे-छोटे वीडियो भी रिकॉर्ड किए जा रहे हैं, जिन्हें सोसाइटी और स्थानीय समूहों में साझा किया जाता है।
अभियान की शुरुआत दक्षिण मुंबई से हुई थी और धीरे-धीरे यह शहर के अन्य इलाकों तक फैलाया गया। अलग-अलग जोन में हजारों ऐसे वरिष्ठ नागरिकों की पहचान की गई है, जो अकेले रहते हैं और संभावित रूप से साइबर अपराधियों के निशाने पर हो सकते हैं। पश्चिमी उपनगरों में ऐसे मामलों की संख्या सबसे अधिक पाई गई, जहां सैकड़ों बुजुर्ग अकेले रहते हैं।
हालांकि, इस पहल को जहां काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है, वहीं कुछ जगहों पर चुनौतियां भी सामने आई हैं। अधिकारियों के अनुसार, कुछ बुजुर्गों ने टीम से मिलने से इनकार कर दिया, जबकि कई बार स्वास्थ्य या उम्र से जुड़ी समस्याओं के कारण बातचीत संभव नहीं हो पाती। इसके बावजूद टीमें लगातार प्रयास कर रही हैं कि अधिक से अधिक लोगों तक यह संदेश पहुंचे।
साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि “डिजिटल अरेस्ट” जैसे मामलों में अपराधी सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लेते हैं। वे डर और दबाव बनाकर पीड़ित को मानसिक रूप से कमजोर करते हैं, जिससे वह बिना सोचे-समझे पैसे ट्रांसफर कर देता है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि इस तरह के मामलों में जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है। “साइबर अपराधी तकनीक से ज्यादा मनोविज्ञान का इस्तेमाल करते हैं। अगर व्यक्ति घबराए नहीं और सतर्क रहे, तो ऐसे जाल से बचा जा सकता है,” उन्होंने कहा।
मुंबई की यह पहल देश के अन्य शहरों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है, जहां बढ़ते साइबर अपराधों के बीच रोकथाम के लिए इस तरह की सक्रिय रणनीति अपनाना समय की जरूरत बनता जा रहा है।
