नई दिल्ली: कनाडा के स्टूडेंट वीजा सिस्टम को लेकर एक अहम ऑडिट रिपोर्ट ने नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट में सामने आया है कि जहां धोखाधड़ी के जोखिम वाले देशों के आवेदनों की मंजूरी दर आमतौर पर कम रहती है, वहीं भारत इस मामले में एक बड़ा अपवाद बनकर उभरा। खासकर फास्ट-ट्रैक स्टूडेंट डायरेक्ट स्ट्रीम (SDS) के तहत भारतीय छात्रों की मंजूरी दर में असामान्य वृद्धि दर्ज की गई, जिसने सिस्टम की पारदर्शिता और निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कनाडा की संसद में पेश ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में SDS के तहत भारतीय छात्रों के वीजा आवेदन की स्वीकृति दर करीब 61% थी, जो 2024 में बढ़कर 98% तक पहुंच गई। यह बढ़ोतरी उस समय हुई जब आंतरिक स्तर पर पहले ही चेतावनी दी जा चुकी थी कि इस फास्ट-ट्रैक स्कीम का इस्तेमाल गैर-वास्तविक छात्र भी कनाडा में प्रवेश के लिए कर रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 2023 के बाद से कनाडा ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए स्टडी परमिट पर नियंत्रण सख्त कर दिया था। जनवरी 2024 में लागू कैप के बाद कुल वीजा संख्या में 30–35% की गिरावट आई। इसके साथ ही SDS स्कीम के फास्ट-ट्रैक फीचर को भी 2024 के अंत तक समाप्त कर दिया गया। इन बदलावों का सीधा असर भारतीय छात्रों की संख्या पर पड़ा।
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आंकड़ों के अनुसार, जहां 2023 में कनाडा में नए स्टूडेंट वीजा पाने वाले भारतीय छात्रों की हिस्सेदारी करीब 51.6% थी, वहीं 2025 (सितंबर तक) यह घटकर केवल 8.1% रह गई। यानी एक ओर कुल संख्या में भारी गिरावट आई, तो दूसरी ओर पहले के वर्षों में असामान्य रूप से उच्च अप्रूवल रेट ने सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए।
रिपोर्ट में यह संकेत भी दिया गया कि कुछ आवेदनों में फर्जी दस्तावेज या गलत जानकारी का इस्तेमाल किया जा सकता है। खासकर उन मामलों में, जहां छात्रों की वास्तविक शैक्षणिक या आर्थिक पृष्ठभूमि संदिग्ध थी, लेकिन फिर भी उन्हें तेजी से वीजा मंजूरी मिल गई। इससे यह आशंका मजबूत होती है कि फास्ट-ट्रैक प्रोसेस में पर्याप्त जांच-पड़ताल नहीं हो पा रही थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि SDS जैसी स्कीम का उद्देश्य वीजा प्रक्रिया को तेज और सरल बनाना था, लेकिन इसका दुरुपयोग होने लगा। तेज अप्रूवल के कारण जांच के कई महत्वपूर्ण चरण कमजोर पड़ गए, जिसका फायदा उठाकर कुछ एजेंट और आवेदक सिस्टम को गुमराह करने में सफल रहे।
ऑडिट रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वीजा प्रक्रिया में जोखिम आकलन (risk assessment) को और मजबूत करने की जरूरत है। खासतौर पर उन देशों के लिए, जहां से बड़ी संख्या में आवेदन आते हैं, वहां अतिरिक्त सत्यापन और डेटा-आधारित निगरानी जरूरी हो जाती है। इससे फर्जी आवेदनों को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने कनाडा के इमिग्रेशन सिस्टम में सुधार की जरूरत को उजागर किया है। अधिकारियों के सामने अब चुनौती है कि वे एक ऐसा संतुलन बनाए रखें, जिसमें वास्तविक छात्रों को सुविधा मिले, लेकिन फर्जी आवेदनों पर सख्त रोक भी लगाई जा सके।
भारत के संदर्भ में यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि बड़ी संख्या में छात्र हर साल उच्च शिक्षा के लिए कनाडा का रुख करते हैं। ऐसे में वीजा प्रक्रिया में पारदर्शिता और सख्ती दोनों जरूरी हो जाती हैं, ताकि वास्तविक छात्रों का भरोसा बना रहे और गलत तरीके से सिस्टम का फायदा उठाने वालों पर लगाम लग सके।
फिलहाल, कनाडा सरकार द्वारा उठाए गए कदम—जैसे स्टडी परमिट पर कैप और SDS फास्ट-ट्रैक को खत्म करना—इसी दिशा में एक प्रयास माने जा रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि ये बदलाव वीजा प्रक्रिया को कितना प्रभावी और भरोसेमंद बना पाते हैं।
कुल मिलाकर, यह मामला वैश्विक स्तर पर बढ़ती स्टूडेंट मोबिलिटी के बीच वीजा सिस्टम की चुनौतियों को सामने लाता है। तेज प्रक्रिया और सख्त जांच के बीच संतुलन ही भविष्य में ऐसे विवादों से बचने का सबसे बड़ा उपाय साबित हो सकता है।
