नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने दिवाला और शोधन अक्षमता कानून को और प्रभावी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए सख्त संशोधनों का प्रस्ताव रखा है। (IBC) में प्रस्तावित बदलावों के तहत अब कानून के दुरुपयोग पर जुर्माना लगाया जाएगा और इन्सॉल्वेंसी आवेदन को 14 दिनों के भीतर स्वीकार करना अनिवार्य होगा।
संसद में वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि IBC प्रक्रिया में देरी की सबसे बड़ी वजह अत्यधिक मुकदमेबाजी है। कई मामलों में जानबूझकर कानूनी पेचीदगियों के जरिए प्रक्रिया को लंबा खींचा जाता है, जिससे न केवल कर्ज वसूली प्रभावित होती है, बल्कि कंपनियों के पुनर्गठन में भी बाधा आती है।
सरकार का मानना है कि इन प्रस्तावित संशोधनों से इस तरह के दुरुपयोग पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सकेगा। नए प्रावधानों के तहत यदि किसी कंपनी में डिफॉल्ट स्थापित हो जाता है, तो संबंधित इन्सॉल्वेंसी आवेदन को 14 दिनों के भीतर स्वीकार करना होगा। इससे मामलों के निपटान में तेजी आने की उम्मीद है और लंबित मामलों का बोझ भी कम होगा।
IBC को देश में बैंकिंग सेक्टर की मजबूती के लिए एक अहम सुधार माना जाता है। वित्त मंत्री ने कहा कि इस कानून ने कंपनियों की क्रेडिट संस्कृति को बेहतर बनाया है और वित्तीय अनुशासन को मजबूत किया है। हालांकि, उन्होंने यह भी दोहराया कि IBC का मूल उद्देश्य केवल कर्ज वसूली नहीं, बल्कि समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करना है।
प्रस्तावित संशोधनों में कुल 12 अहम बदलाव शामिल हैं, जिनका मकसद दिवाला प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और आधुनिक बनाना है। इनमें ग्रुप इन्सॉल्वेंसी का प्रावधान भी शामिल है, जिससे एक ही कॉर्पोरेट समूह की कई कंपनियों के मामलों को एक साथ सुलझाया जा सकेगा। इसके अलावा, क्रॉस-बॉर्डर इन्सॉल्वेंसी के लिए भी स्पष्ट नियम लाने की योजना है, जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मामलों में कानूनी अस्पष्टता दूर होगी।
सरकार का कहना है कि इन बदलावों से पारदर्शिता बढ़ेगी और निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होगा। खासकर विदेशी निवेशकों के लिए यह संकेत होगा कि भारत में दिवाला प्रक्रिया स्पष्ट और समयबद्ध है, जिससे निवेश का माहौल बेहतर होगा।
वित्त मंत्री ने यह भी जोर देकर कहा कि IBC प्रक्रिया में श्रमिकों और कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहेगी। कानून में पहले से ही उनके बकाया भुगतान को प्राथमिकता दी जाती है, और प्रस्तावित संशोधन इस सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि समयबद्ध प्रक्रिया लागू होने से बैंकों के फंसे हुए कर्ज (NPA) की समस्या को भी कम करने में मदद मिलेगी। लंबे समय तक लंबित मामलों के कारण बैंकों की बैलेंस शीट पर दबाव बढ़ता है, जिसे इन सुधारों के जरिए कम किया जा सकता है।
हालांकि, कुछ जानकार यह भी मानते हैं कि सख्त समयसीमा लागू करने के साथ-साथ न्यायिक क्षमता को भी बढ़ाना होगा, ताकि बढ़ते मामलों का तेजी से निपटान किया जा सके। केवल नियम सख्त करने से ही समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी ध्यान देना जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, IBC में प्रस्तावित ये संशोधन देश की दिवाला समाधान प्रणाली को अधिक तेज, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक अहम पहल माने जा रहे हैं। आने वाले समय में इन बदलावों के लागू होने के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वाकई लंबित मामलों में तेजी आती है और क्या यह कानून अपने मूल उद्देश्य—समयबद्ध समाधान—को पूरी तरह हासिल कर पाता है।
