नई दिल्ली: देश में डिजिटल पेमेंट की रीढ़ बन चुके Unified Payments Interface (UPI) पर अब शुल्क लगाने की बहस संसद तक पहुंच गई है। एक संसदीय समिति ने सुझाव दिया है कि मौजूदा “पूरी तरह मुफ्त” मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है, इसलिए अब टियर आधारित चार्जिंग सिस्टम लागू करने पर विचार होना चाहिए।
समिति की यह सिफारिश ऐसे समय आई है जब UPI का तेजी से बढ़ता ग्रोथ ग्राफ अब थोड़ा धीमा पड़ने लगा है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026 तक ट्रांजैक्शन ग्रोथ करीब 25% तक सीमित हो सकती है, जबकि पिछले साल यह 40% से ज्यादा थी। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संकेत है कि सिस्टम अब परिपक्व हो रहा है और उसे टिकाऊ बनाने के लिए नए राजस्व मॉडल की जरूरत है।
UPI ने 2025 में करीब ₹300 लाख करोड़ (₹300 ट्रिलियन) के ट्रांजैक्शन प्रोसेस किए, जो अपने आप में रिकॉर्ड है। लेकिन इस बड़े आंकड़े के पीछे छिपी सच्चाई यह है कि इस सिस्टम को चलाने की लागत तेजी से बढ़ रही है, जबकि कमाई लगभग नगण्य है। बैंकों, फिनटेक कंपनियों और National Payments Corporation of India (NPCI) को मिलाकर वित्त वर्ष 2024 में करीब ₹12,000 करोड़ खर्च करने पड़े, जबकि उन्हें केवल ₹3,000 करोड़ की भरपाई मिली।
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यानी लगभग ₹9,000 करोड़ का घाटा इस पूरे इकोसिस्टम पर भारी पड़ रहा है। यही वजह है कि लंबे समय से उद्योग जगत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने की मांग करता रहा है। अब संसद की समिति का समर्थन मिलने से यह बहस और तेज हो गई है।
समिति की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार द्वारा दी जा रही प्रोत्साहन राशि कुल लागत का सिर्फ 11% ही कवर कर पा रही है। ऐसे में डिजिटल पेमेंट सिस्टम को मजबूती देने के लिए या तो सब्सिडी बढ़ानी होगी या फिर ट्रांजैक्शन पर कुछ शुल्क लागू करना होगा।
हालांकि सरकार अब तक UPI को “पब्लिक गुड” मानते हुए इसे पूरी तरह मुफ्त बनाए रखने के पक्ष में रही है। लेकिन बढ़ती लागत और घटती सब्सिडी के बीच यह मॉडल दबाव में आता दिख रहा है। वित्त वर्ष 2027 के लिए UPI इकोसिस्टम को ₹2,000 करोड़ की ही सहायता प्रस्तावित है, जिसे उद्योग जगत अपर्याप्त मान रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि टियर आधारित चार्जिंग मॉडल इस समस्या का संतुलित समाधान हो सकता है। इसके तहत छोटे ट्रांजैक्शन और छोटे व्यापारियों को पूरी तरह छूट दी जा सकती है, जबकि बड़े ट्रांजैक्शन या बड़े कारोबारियों पर सीमित शुल्क लगाया जा सकता है। इससे आम यूजर्स पर बोझ नहीं पड़ेगा और सिस्टम को जरूरी राजस्व भी मिल जाएगा।
देश में इस समय करीब 6 करोड़ व्यापारी डिजिटल पेमेंट स्वीकार कर रहे हैं, जिनमें से 90% छोटे व्यापारी हैं जिनका सालाना टर्नओवर ₹20 लाख से कम है। ऐसे में किसी भी नए शुल्क मॉडल में इन छोटे कारोबारियों को सुरक्षा देना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर समय रहते राजस्व का स्थायी मॉडल नहीं बनाया गया, तो इससे इनोवेशन और सिक्योरिटी दोनों प्रभावित हो सकते हैं। डिजिटल पेमेंट सिस्टम जितना बड़ा होता जा रहा है, उसे उतना ही ज्यादा निवेश और टेक्नोलॉजी की जरूरत है।
संसदीय समिति ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले 5 से 7 वर्षों में UPI का विस्तार 10 गुना तक हो सकता है। इस दौरान 60 करोड़ नए यूजर्स जुड़ सकते हैं और हर महीने 100 से 150 अरब ट्रांजैक्शन तक पहुंचने की संभावना है। ऐसे बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए मजबूत फंडिंग मॉडल बेहद जरूरी माना जा रहा है।
फिलहाल गेंद सरकार के पाले में है। यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार मुफ्त UPI मॉडल को जारी रखती है या फिर धीरे-धीरे शुल्क लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाती है। लेकिन इतना तय है कि डिजिटल इंडिया की इस सबसे बड़ी सफलता को आगे बढ़ाने के लिए अब आर्थिक संतुलन बनाना अनिवार्य हो गया है।
