साइबर फ्रॉड और वित्तीय अपराधों के खिलाफ रियल-टाइम इंटेलिजेंस साझाकरण को मजबूत करने के लिए FIU-IND और I4C के बीच हुए समझौते का प्रतीकात्मक दृश्य

साइबर अपराध का बढ़ता जाल: एक साल में 62.72 लाख केस, ₹4,725 करोड़ की ठगी समय रहते रोकी गई

Team The420
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नई दिल्ली: देश में साइबर अपराध अब अलग-थलग घटनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक संगठित, तेज़ और व्यापक खतरे के रूप में उभर चुका है। गृह मंत्रालय की ताजा वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, एक साल में 62.72 लाख साइबर अपराध के मामले दर्ज किए गए, जो डिजिटल दुनिया में बढ़ती आपराधिक गतिविधियों और सिस्टम की कमजोरियों की ओर इशारा करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, साइबर अपराध का सबसे बड़ा हिस्सा अभी भी वित्तीय ठगी का है। हालांकि, सरकार की त्वरित हस्तक्षेप प्रणाली के चलते ₹4,725 करोड़ की संभावित ठगी को रोका गया, जो इस बात का संकेत है कि रियल-टाइम मॉनिटरिंग और शिकायत तंत्र अब अधिक प्रभावी हो रहा है।

साइबर ठगी में इस्तेमाल होने वाले नेटवर्क पर कार्रवाई करते हुए 8.45 लाख सिम कार्ड ब्लॉक किए गए। यह आंकड़ा दिखाता है कि साइबर अपराधी अब टेलीकॉम संसाधनों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग कर रहे हैं और उनका नेटवर्क गहराई तक फैला हुआ है।

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संगठित और अंतरराष्ट्रीय हो चुका है साइबर अपराध

रिपोर्ट में सामने आया है कि साइबर अपराध अब सिर्फ छोटे-मोटे ऑनलाइन फ्रॉड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संगठित और सीमा-पार ऑपरेशन का रूप ले चुका है। अपराधी अब तकनीक, सोशल इंजीनियरिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर लोगों को निशाना बना रहे हैं।

इसी दिशा में देश की प्रमुख एजेंसी Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) ने अपने ऑपरेशन का विस्तार किया है। टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय के जरिए अब साइबर अपराध से निपटने की क्षमता को मजबूत किया जा रहा है।

सरकार के ‘सहयोग पोर्टल’ के माध्यम से आईटी एक्ट की धारा 79(3)(b) के तहत इंटरमीडियरी प्लेटफॉर्म्स को ऑटोमेटेड नोटिस भेजे जा रहे हैं। मार्च 2025 तक 1,11,185 संदिग्ध ऑनलाइन कंटेंट ब्लॉक किए जा चुके हैं, जिनमें 83,867 व्हाट्सएप अकाउंट्स शामिल हैं, जो साइबर अपराध से जुड़े पाए गए।

नए-नए रूपों में सामने आ रहे साइबर फ्रॉड

रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट हुआ है कि साइबर अपराध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। जहां पहले केवल बैंकिंग फ्रॉड प्रमुख थे, वहीं अब इम्पर्सोनेशन (किसी और बनकर ठगी), पहचान चोरी (Identity Theft) और प्लेटफॉर्म-आधारित स्कैम तेजी से बढ़ रहे हैं।

अधिकारियों के अनुसार, एक बड़े ऑपरेशन में ‘Wingo’ नामक एंड्रॉयड ऐप के नेटवर्क को ध्वस्त किया गया, जिससे रोजाना करीब 1.5 लाख संभावित पीड़ितों को ठगी से बचाया जा सका। यह दिखाता है कि साइबर अपराधी अब ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए बड़े पैमाने पर लोगों को निशाना बना रहे हैं।

चुनौतियां बरकरार, लेकिन सिस्टम हो रहा मजबूत

हालांकि सरकार और एजेंसियों की कार्रवाई से कई मामलों में रोकथाम संभव हुई है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। भारत में कानून-व्यवस्था राज्य का विषय होने के कारण अलग-अलग राज्यों में साइबर अपराध से निपटने की क्षमता में अंतर देखने को मिलता है।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि देश में साइबर अपराध से निपटने के लिए अब इंटीग्रेटेड और प्रोएक्टिव मॉडल की जरूरत है, जिसमें वित्तीय ट्रैकिंग, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर ब्लॉकिंग और कंटेंट मॉडरेशन को एक साथ जोड़ा जाए।

प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी Prof. Triveni Singh के अनुसार, “साइबर अपराधी अब सोशल इंजीनियरिंग, फर्जी ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर आम लोगों को फंसा रहे हैं। जागरूकता और त्वरित रिपोर्टिंग ही सबसे बड़ा बचाव है।”

बढ़ते आंकड़े दे रहे दोहरा संकेत

रिपोर्ट के आंकड़े—62.72 लाख मामले, ₹4,725 करोड़ की बचत, 8.45 लाख सिम ब्लॉक, 1.11 लाख से अधिक कंटेंट हटाए गए और हजारों अकाउंट्स पर कार्रवाई—एक तरफ जहां बढ़ते खतरे को दर्शाते हैं, वहीं दूसरी ओर यह भी दिखाते हैं कि सिस्टम लगातार मजबूत हो रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में साइबर अपराध से निपटने की सफलता संस्थागत मजबूती, नागरिकों की जागरूकता और वैश्विक सहयोग पर निर्भर करेगी। फिलहाल, भारत इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन चुनौती अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

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