मुंबई: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रेडिट कार्ड डेटा चोरी और साइबर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें मालदीव के मानद कांसुल ने मुंबई में शिकायत दर्ज कराई है। आरोप है कि उनके विदेशी बैंक द्वारा जारी क्रेडिट कार्ड का दुरुपयोग कर इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में ₹4.59 लाख का फर्जी ट्रांजेक्शन किया गया। घटना के समय वह दिल्ली से मुंबई की फ्लाइट में थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह मामला अंतरराष्ट्रीय साइबर धोखाधड़ी से जुड़ा है।
पीड़ित के अनुसार, अक्टूबर 2025 में हुई इस घटना के दौरान उनकी पत्नी को ईमेल के जरिए ट्रांजेक्शन का अलर्ट मिला। इसके तुरंत बाद बैंक को सूचित कर ट्रांजेक्शन रोकने और कार्ड ब्लॉक करने का अनुरोध किया गया। मुंबई पहुंचने पर उन्होंने खुद भी बैंक से संपर्क कर इस संदिग्ध लेनदेन की पुष्टि की और तत्काल कार्रवाई की मांग की। बावजूद इसके, आरोप है कि बैंक ने समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि बैंक ने न तो ट्रांजेक्शन को समय पर रोका और न ही उसे संदिग्ध मानकर जांच की। उल्टा, बाद में उसी रकम पर फाइनेंस चार्ज और पेनल्टी लगाई गई, जिससे पीड़ित का क्रेडिट स्कोर (CIBIL) भी प्रभावित हुआ। इस पर पीड़ित ने बैंक के खिलाफ गंभीर लापरवाही और उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया है।
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जूहू पुलिस ने पीड़ित की शिकायत के आधार पर अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और आईटी एक्ट के तहत पहचान की चोरी और प्रतिरूपण (इम्पर्सनेशन) का मामला दर्ज किया है। मामले की जांच साइबर टीम को सौंपी गई है, जो बैंक से विस्तृत जानकारी जुटा रही है और यह समझने की कोशिश कर रही है कि समय रहते ट्रांजेक्शन को फ्लैग क्यों नहीं किया गया।
जांच के दौरान पुलिस बैंक के संबंधित कर्मचारियों से भी पूछताछ कर सकती है, क्योंकि पीड़ित ने अपने कार्ड डेटा के लीक होने में अंदरूनी भूमिका की आशंका जताई है। उनका कहना है कि इस तरह के हाई-वैल्यू अंतरराष्ट्रीय ट्रांजेक्शन को बिना वेरिफिकेशन के प्रोसेस करना गंभीर चूक है और इसमें संभावित मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता।
पीड़ित ने यह भी बताया कि कई बार पत्राचार और शिकायतों के बाद बैंक ने लगभग 40 दिनों के भीतर ₹2.29 लाख की राशि वापस कर दी, जो कुल ट्रांजेक्शन का लगभग 50 प्रतिशत है। उनके अनुसार, यह बैंक द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से धोखाधड़ी को स्वीकार करने जैसा है। हालांकि, शेष राशि को लेकर विवाद अभी भी जारी है।
इस मामले में पीड़ित ने रिजर्व बैंक के ओम्बड्समैन और गवर्नर को भी शिकायत भेजी है, लेकिन अब तक कोई संतोषजनक समाधान नहीं मिला है। उनका आरोप है कि बैंक ने उल्टा उन्हें ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की और भुगतान न करने पर क्रेडिट रिपोर्ट खराब करने की चेतावनी दी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में अक्सर कार्ड डिटेल्स डेटा ब्रीच, फिशिंग या स्किमिंग के जरिए चोरी की जाती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले ऐसे ट्रांजेक्शन को ट्रैक करना और रोकना चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन बैंकिंग सिस्टम में मौजूद फ्रॉड डिटेक्शन मैकेनिज्म का सक्रिय होना बेहद जरूरी है।
यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या बैंकिंग संस्थाएं ग्राहकों के डेटा और ट्रांजेक्शन की सुरक्षा के प्रति पर्याप्त रूप से सतर्क हैं। खासकर जब ग्राहक समय पर अलर्ट और शिकायत दर्ज कर देता है, तब भी यदि कार्रवाई नहीं होती, तो यह सिस्टम की गंभीर खामी को दर्शाता है।
जांच एजेंसियां अब इस पूरे प्रकरण की गहराई से पड़ताल कर रही हैं। यह देखा जा रहा है कि ट्रांजेक्शन किस माध्यम से किया गया, डेटा कहां से लीक हुआ और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका हो सकती है। आने वाले दिनों में इस मामले में और खुलासे होने की संभावना है, जो अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी के नेटवर्क को उजागर कर सकते हैं।
