नई दिल्ली: संसद की एक समिति ने सरकार से महिलाओं के खिलाफ बढ़ते साइबर अपराधों को रोकने के लिए जेंडर सेंसिटिव साइबर कानून बनाने की सिफारिश की है। समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में वर्तमान कानून और नीतियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साइबर अपराधों पर नियंत्रण करने में पर्याप्त नहीं हैं, विशेषकर जब अपराधी देश से बाहर ऑपरेट करने वाले प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं।
रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ साइबर अपराधों में पीड़ितों के पुनर्स्थापन और न्याय तक पहुँचने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाना आवश्यक है। वर्तमान में इन मामलों की जांच में एक समान और तेज़ प्रक्रिया स्थापित करना चुनौतीपूर्ण है।
विशेष रूप से विदेशी सोशल मीडिया कंपनियों और प्लेटफॉर्म से संबंधित मामलों में भारतीय एजेंसियों को सूचना हासिल करने और डिजिटल साक्ष्य प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि यूजर डेटा और आईपी डीटेल्स जैसी जानकारी प्राप्त करने में देरी होने से जांच धीमी पड़ती है।
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समिति ने कहा कि कई बार वैश्विक प्लेटफॉर्म म्युचुअल लीगल असिस्टेंस ट्रीटी (MLAT) प्रक्रिया को आधार बनाकर जांच में महीनों लगाते हैं। डीपफेक कंटेंट और सेक्सटॉर्शन जैसे मामलों में इसका प्रत्यक्ष असर पीड़ितों पर पड़ता है और उनका मानसिक तनाव बढ़ता है। इसके अलावा, कई विदेशी प्लेटफॉर्म संबंधित कंटेंट तुरंत नहीं हटाते, जिससे पीड़ित को लंबी और कष्टकारी प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है।
कमेटी ने यह भी बताया कि अपराधी अक्सर VPN, डार्क वेब फोरम और क्रॉस-बॉर्डर भुगतान चैनल का उपयोग करते हैं ताकि उन्हें पहचानना मुश्किल हो। यौन उत्पीड़न और अन्य साइबर अपराधों के मामलों में भारतीय एजेंसियों और विदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच रियल-टाइम सहयोग का कोई स्थिर फ्रेमवर्क मौजूद नहीं है, जिससे कार्रवाई और रोकथाम प्रभावित होती है।
रिपोर्ट में बताया गया कि भारतीय साइबर स्पेस मुख्यतः आईटी एक्ट के तहत विनियमित है। वर्तमान में ऑनलाइन गतिविधियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के विनियमन के लिए यह प्राथमिक कानून है। इस कानून में कुल 18 धाराएं हैं, जिनमें 12 धाराओं में जमानत मिल सकती है जबकि 6 धाराएं गैर-जमानती हैं। यह साइबर अपराधों को बड़े पैमाने पर नियंत्रित करने का आधार प्रदान करती हैं।
सारांश में समिति ने सरकार से आग्रह किया है कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ साइबर अपराधों को रोकने और पीड़ितों के संरक्षण के लिए एक समर्पित, जेंडर सेंसिटिव कानून तैयार किया जाए। इससे न केवल जांच प्रक्रिया मजबूत होगी, बल्कि न्याय तक पहुँचने की गति भी बढ़ेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि देश में डिजिटल लेनदेन और ऑनलाइन गतिविधियों के बढ़ते मामलों के बीच, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए ऐसे कानून की तत्काल आवश्यकता है। रिपोर्ट में सुझाए गए सुधारों को लागू करना भारतीय साइबर सुरक्षा परिदृश्य को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बना सकता है।
