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BSF अफसर बनकर लगाया ₹26 लाख का चूना: फर्जी खरीद आदेश के जाल में फंसी बेंगलुरु की कंपनी

Roopa
By Roopa
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बेंगलुरु: साइबर ठगों ने खुद को Border Security Force (BSF) का अधिकारी बताकर एक निजी कंपनी से ₹26 लाख की ठगी को अंजाम दिया। फर्जी खरीद आदेश (Purchase Order) और “डिफेंस प्रोक्योरमेंट” का झांसा देकर ठगों ने पहले कंपनी का भरोसा जीता और फिर चरणबद्ध तरीके से रकम अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करवा ली।

पीड़ित कंपनी ‘UNICASE’ देशभर में हार्ड प्लास्टिक केस की सप्लाई करती है और रक्षा संगठनों को भी सामान उपलब्ध कराती है। कंपनी के संचालकों महेश पाटिल और रविंद्र एस पाटिल ने अपनी शिकायत में बताया कि 9 मार्च को उन्हें एक व्यक्ति का कॉल आया, जिसने खुद को BSF के येलहंका स्थित खरीद विभाग का कर्मचारी ‘अक्षय कुमार’ बताया। बातचीत के दौरान उसने बड़ी मात्रा में उत्पाद खरीदने की बात कही और आधिकारिक प्रक्रिया का हवाला देते हुए भरोसा दिलाया।

दो दिन बाद, 11 मार्च को आरोपियों ने कंपनी को एक फर्जी खरीद आदेश भेजा, जो देखने में पूरी तरह असली सरकारी दस्तावेज जैसा था। इसके बाद कंपनी ने 50 प्रतिशत एडवांस के लिए प्रोफॉर्मा इनवॉइस जारी किया। इसी दौरान एक अन्य व्यक्ति ‘कुलदीप सिंह’ के नाम से संपर्क में आया, जिसने खुद को BSF के अकाउंट्स विभाग का अधिकारी बताया और कहा कि भुगतान “भारतीय सेना की प्रक्रिया” के तहत किया जाएगा।

शिकायत के मुताबिक, ठगों ने पहले कंपनी से छोटे-छोटे “टेस्ट ट्रांजेक्शन” करवाए। इनमें से एक ट्रांजेक्शन में रकम वापस कर दी गई और उससे अधिक राशि लौटाई गई, ताकि कंपनी का विश्वास पूरी तरह जीत लिया जाए। इसके बाद आरोपियों ने बड़े ट्रांजेक्शन कराने शुरू किए और रकम अलग-अलग बैंक खातों में भेजने के निर्देश दिए।

कंपनी को तब तक शक नहीं हुआ, जब तक कि कुल मिलाकर ₹26 लाख से अधिक की राशि ट्रांसफर नहीं हो गई। बाद में जब संपर्क टूट गया और कोई जवाब नहीं मिला, तब कंपनी को ठगी का एहसास हुआ। इसके बाद तुरंत साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई गई और सभी ट्रांजेक्शन डिटेल्स साझा किए गए।

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जांच में सामने आया कि यह पूरा फ्रॉड सुनियोजित तरीके से किया गया, जिसमें सरकारी पहचान और डिफेंस सेक्टर का नाम इस्तेमाल कर भरोसा बनाया गया। ठगों ने मनोवैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए पीड़ितों को यह विश्वास दिलाया कि वे एक वैध सरकारी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

साइबर अपराध के विशेषज्ञ बताते हैं कि इस तरह के मामलों में “सोशल इंजीनियरिंग” सबसे बड़ा हथियार होता है, जहां अपराधी भरोसा जीतने के लिए आधिकारिक पहचान, दस्तावेज और भाषा का इस्तेमाल करते हैं। एक साइबर सुरक्षा शोधकर्ता के अनुसार, “फर्जी खरीद आदेश और रिफंड ट्रांजेक्शन जैसे तरीके पीड़ित को मानसिक रूप से आश्वस्त कर देते हैं कि प्रक्रिया असली है, जबकि असल में यह एक जाल होता है।”

मामले में जिन बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर किए गए, उन्हें ट्रेस करने और फ्रीज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। साथ ही, आरोपियों की पहचान और लोकेशन का पता लगाने के प्रयास जारी हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी बड़े ऑर्डर या सरकारी खरीद से जुड़े प्रस्ताव में भुगतान से पहले आधिकारिक ईमेल, डोमेन और संबंधित विभाग से स्वतंत्र रूप से सत्यापन करना जरूरी है। खासकर जब भुगतान कई खातों में विभाजित करने के लिए कहा जाए, तो सतर्कता बरतना बेहद आवश्यक है।

यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि कैसे साइबर ठग अब पारंपरिक धोखाधड़ी से आगे बढ़कर कॉर्पोरेट सेक्टर और सप्लाई चेन को निशाना बना रहे हैं।

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