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सरकारी डेटा से टारगेट चुन रहा लॉरेंस बिश्नोई गैंग: सोशल मीडिया स्कैन कर बना रहा वसूली की लिस्ट

Roopa
By Roopa
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भोपाल: कुख्यात Lawrence Bishnoi gang के काम करने के तरीके को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। हालिया पूछताछ में सामने आया है कि गैंग अब सरकारी डेटाबेस और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का सुनियोजित तरीके से इस्तेमाल कर अमीर कारोबारियों और संभावित टारगेट्स की पहचान कर रहा है।

जांच में यह सामने आया है कि गैंग के सदस्य Goods and Services Tax (GST) और Real Estate Regulatory Authority (RERA) जैसे पोर्टलों से कंपनियों के प्रोजेक्ट, प्रमोटर्स और टर्नओवर से जुड़ी विस्तृत जानकारी निकालते हैं। इसके बाद सोशल मीडिया प्रोफाइल्स की गहन स्कैनिंग कर टारगेट के निजी और कारोबारी नेटवर्क की पूरी प्रोफाइल तैयार की जाती है।

सूत्रों के मुताबिक, इस तरह जुटाई गई जानकारी का इस्तेमाल रंगदारी मांगते समय मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए किया जाता है। जब धमकी भरे कॉल या मैसेज किए जाते हैं, तो टारगेट को यह महसूस कराया जाता है कि अपराधियों के पास उसकी हर निजी और कारोबारी जानकारी मौजूद है, जिससे डर और बढ़ जाता है।

जांच में यह भी सामने आया है कि गैंग के प्रमुख ऑपरेटिव—Harry Boxer और Ritik Boxer—विदेश से इस पूरे नेटवर्क को संचालित कर रहे हैं। ये पहले टारगेट की पहचान करते हैं और फिर युवाओं को ‘फील्ड ऑपरेटिव’ के रूप में भर्ती कर उन्हें डराने-धमकाने के लिए भेजते हैं।

इसी कड़ी में 19 वर्षीय Manish Jangid को गिरफ्तार किया गया, जिसे एक कारोबारी के घर पर पेट्रोल बम फेंकने की साजिश के तहत तैनात किया गया था। पूछताछ में उसने बताया कि वह सोशल मीडिया पर गैंग के सदस्यों की लग्जरी लाइफस्टाइल से प्रभावित होकर उनसे जुड़ा था और बाद में उसे अलग-अलग शहरों में टारगेट्स को धमकाने का काम सौंपा गया।

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जांच एजेंसियों के अनुसार, गैंग खासतौर पर 15 से 17 वर्ष के किशोरों को भर्ती कर रहा है, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होता। इसका मकसद गिरफ्तारी की स्थिति में उन्हें आसानी से जमानत मिलना और पुलिस को सीमित जानकारी मिलना है।

मामले में गिरफ्तार अन्य आरोपियों—Dinesh Suthar और Pawan Sharma—से पूछताछ में भी इसी तरह के खुलासे हुए हैं। जांच में यह भी सामने आया है कि गैंग के सदस्य फंड ट्रांसफर के लिए अलग-अलग स्थानों पर पब्लिक पेमेंट कियोस्क का इस्तेमाल करते हैं, जिससे ट्रांजेक्शन को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।

तकनीकी तौर पर गैंग काफी सतर्क है। आपसी संपर्क के लिए Signal जैसे एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे उनकी बातचीत को ट्रेस करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। डिजिटल सबूतों से यह भी संकेत मिले हैं कि गैंग के सदस्य विदेशों और जेल के भीतर से भी लगातार संपर्क में बने हुए हैं।

जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि नए ऑपरेटिव्स को वीडियो कॉल के जरिए ट्रेनिंग दी जाती है, जिसमें उन्हें डर पैदा करने और हमले को अंजाम देने के तरीके सिखाए जाते हैं। इससे साफ है कि यह नेटवर्क संगठित, बहुस्तरीय और तकनीकी रूप से काफी सक्षम है।

फिलहाल इस मामले में कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, जबकि अन्य आरोपियों की तलाश जारी है। जांच एजेंसियां इस नेटवर्क के अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन और इसके पूरे दायरे का पता लगाने में जुटी हैं।

यह मामला इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि संगठित अपराध अब डिजिटल और डेटा-आधारित होता जा रहा है, जहां सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी का दुरुपयोग कर सुनियोजित तरीके से अपराध को अंजाम दिया जा रहा है।

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