सुप्रीम कोर्ट ने अनिल अंबानी समूह से जुड़े बहु-हजार करोड़ मामलों में CBI और ED को निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।

एआई से तैयार फर्जी कोर्ट फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: कहा—यह वैश्विक न्याय प्रणाली के लिए गंभीर खतरा

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते इस्तेमाल के बीच एक गंभीर प्रवृत्ति पर चिंता जताई है। अदालत ने कहा है कि एआई की मदद से तैयार किए गए ऐसे फर्जी न्यायिक फैसलों का हवाला दिया जा रहा है, जो वास्तविकता में किसी भी अदालत द्वारा पारित नहीं किए गए। शीर्ष अदालत ने इस प्रवृत्ति को न केवल भारत बल्कि वैश्विक न्याय प्रणाली के लिए खतरनाक बताया है।

यह टिप्पणी उस समय आई जब अदालत एक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक निजी कंपनी के निदेशक ने बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा की गई कुछ टिप्पणियों को हटाने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी तब की थी, जब सुनवाई के दौरान एक ऐसे फैसले का हवाला दिया गया, जो एआई की सहायता से तैयार किया गया था, लेकिन वास्तविक न्यायिक रिकॉर्ड में उसका कोई अस्तित्व नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने माना कि एआई आधारित टूल्स के जरिए इस तरह के ‘काल्पनिक फैसले’ तैयार करना और उन्हें न्यायालय में मिसाल के रूप में पेश करना एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनती जा रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की प्रैक्टिस न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है और इससे न्याय वितरण प्रणाली पर गंभीर असर पड़ सकता है।

पीठ ने यह भी कहा कि यह समस्या किसी एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर उभर रही है। एआई टूल्स की पहुंच और उपयोग में तेजी से बढ़ोतरी के कारण इस तरह के फर्जी कंटेंट का निर्माण और प्रसार आसान हो गया है। ऐसे में न्यायिक संस्थानों, वकीलों और अन्य संबंधित पक्षों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है।

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अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि एआई एक उपयोगी तकनीक हो सकती है, लेकिन इसका उपयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए। बिना सत्यापन के एआई द्वारा तैयार सामग्री को अदालत में प्रस्तुत करना न केवल पेशेवर आचरण के खिलाफ है, बल्कि यह न्याय प्रक्रिया को भी भ्रमित कर सकता है।

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों को हटाने का निर्णय लिया, लेकिन साथ ही इस व्यापक मुद्दे पर अपनी चिंता दर्ज कराई। अदालत ने संकेत दिया कि भविष्य में इस तरह के मामलों में सख्ती बरती जा सकती है और आवश्यक दिशा-निर्देश भी तय किए जा सकते हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि एआई आधारित टूल्स के बढ़ते इस्तेमाल के साथ-साथ उनके दुरुपयोग की आशंका भी बढ़ी है। खासकर न्यायिक क्षेत्र में, जहां सटीकता और प्रामाणिकता सर्वोपरि होती है, वहां इस तरह के फर्जी दस्तावेज गंभीर परिणाम ला सकते हैं।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि तकनीक के तेजी से विस्तार के बीच नियमन और सत्यापन के तंत्र कितने मजबूत हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न्यायिक समुदाय के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि एआई के उपयोग में सावधानी और जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

फिलहाल अदालत ने सभी पक्षों—न्यायाधीशों, वकीलों और संबंधित संस्थानों—को इस मुद्दे पर सतर्क रहने की सलाह दी है, ताकि न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता और पारदर्शिता बनी रहे।

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