डिजिटल अरेस्ट के जाल में फंसे लखनऊ के दो परिवार: रिटायर्ड JE वीरेंद्र सिंह से ₹1.18 करोड़ और IIT प्रोफेसर के माता-पिता से ₹12.9 लाख लूटे। ठगों ने जांच एजेंसी बनकर डराया, वीडियो कॉल से अलग-थलग किया। साइबर पुलिस जांच शुरू।

डिजिटल अरेस्ट का जाल: जागरूकता के बावजूद लखनऊ में दो परिवारों से ₹1.30 करोड़ की ठगी

Team The420
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देशभर में लगातार चल रहे साइबर जागरूकता अभियानों के बावजूद डिजिटल अरेस्ट जैसे फ्रॉड थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। ताजा मामला लखनऊ का है, जहां साइबर जालसाजों ने दो अलग-अलग घटनाओं में बुजुर्ग दंपतियों को निशाना बनाकर कुल ₹1.30 करोड़ की ठगी कर ली।

पहले मामले में बिजली विभाग से रिटायर जूनियर इंजीनियर वीरेंद्र सिंह और उनकी पत्नी को करीब ढाई महीने तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर मानसिक दबाव में रखा गया और उनसे ₹1.18 करोड़ ट्रांसफर करा लिए गए। पीड़ित दंपति गुड़ंबा क्षेत्र के कंचना विहारी मार्ग स्थित अवध एन्क्लेव में रहते हैं।

शिकायत के मुताबिक, 15 दिसंबर को वीरेंद्र सिंह के पास एक कॉल आया, जिसमें कॉलर ने खुद को दूरसंचार नियामक संस्था का अधिकारी संजय शर्मा बताया। उसने दावा किया कि उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के 17 केस दर्ज हैं और गिरफ्तारी तय है। इसके बाद उन्हें कथित तौर पर दिल्ली के एक पुलिस थाने से जुड़े नंबर दिए गए, जहां संपर्क करने पर उन्हें ‘जांच’ के नाम पर प्रक्रिया में उलझा लिया गया।

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धीरे-धीरे जालसाजों ने दंपति को यह विश्वास दिलाया कि वे निगरानी में हैं और किसी से संपर्क करने पर गंभीर परिणाम होंगे। वीडियो कॉल के जरिए खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताने वाले व्यक्ति ने उन्हें पूरी तरह अलग-थलग कर दिया। इसी दौरान बैंक खाते, आधार, पैन और निवेश से जुड़ी पूरी जानकारी हासिल कर ली गई।

16 जनवरी से 27 फरवरी के बीच दंपति से अलग-अलग खातों में कुल ₹1,17,90,000 ट्रांसफर करा लिए गए। जब खाते लगभग खाली हो गए, तब ठगों ने ‘जमानत’ के नाम पर और पैसे की मांग की। इसी दौरान पीड़ितों को ठगी का अहसास हुआ और उन्होंने परिवार को जानकारी दी।

दूसरे मामले में आईआईटी दिल्ली के सहायक प्रोफेसर डॉ. सौरभ तिवारी के बुजुर्ग माता-पिता को तीन दिन तक डिजिटल अरेस्ट में रखा गया। इंदिरानगर सी ब्लॉक निवासी दंपति को डर और दबाव में रखकर ₹12.90 लाख की ठगी कर ली गई।

दोनों ही मामलों में एक समान तरीका अपनाया गया—पहले सरकारी एजेंसी का डर, फिर कानूनी कार्रवाई का भय, और अंत में ‘डिजिटल निगरानी’ के नाम पर पीड़ितों को मानसिक रूप से नियंत्रित करना। इस दौरान पीड़ितों को किसी से बात न करने की हिदायत दी जाती है, जिससे वे मदद नहीं ले पाते।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार और साइबर सुरक्षा एजेंसियां लगातार यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि कोई भी जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को फोन या वीडियो कॉल के जरिए ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं करती। इसके बावजूद ठग लोगों के डर और भ्रम का फायदा उठाकर इस तरह के अपराध को अंजाम दे रहे हैं।

प्रख्यात साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, ऐसे मामलों में अपराधी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का सहारा लेते हैं। वे पहले भरोसा जीतते हैं, फिर डर पैदा करते हैं और अंत में पीड़ित को मानसिक रूप से इतना कमजोर कर देते हैं कि वह बिना सत्यापन किए निर्देशों का पालन करने लगता है।

फिलहाल दोनों मामलों में साइबर थाने में मुकदमे दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है और किसी भी संदिग्ध कॉल या डिजिटल अरेस्ट के दावे पर तुरंत स्थानीय पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करना चाहिए।

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