कानपुर। किदवईनगर में फर्जी डिग्री और मार्कशीट बनाने वाले संगठित गिरोह के भंडाफोड़ के बाद जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, नए चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। अब मध्य प्रदेश के छतरपुर स्थित श्रीकृष्णा यूनिवर्सिटी के नाम पर जारी की गई बड़ी संख्या में डिग्रियां और मार्कशीट भी जांच के घेरे में आ गई हैं। बरामद 103 दस्तावेजों में से 67 को फर्जी पाया गया है, जबकि 36 को विश्वविद्यालय ने सही करार दिया है।
जांच से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, इस पूरे मामले में विश्वविद्यालय के एक कर्मचारी की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है, जो गिरोह के संपर्क में था। उससे पूछताछ के बाद गिरफ्तारी की संभावना जताई जा रही है।
यह पूरा मामला 18 फरवरी को सामने आया था, जब जूही गौशाला स्थित एक निजी संस्थान के कार्यालय पर छापेमारी की गई। यहां से नौ राज्यों के 14 विश्वविद्यालयों से जुड़े एक हजार से अधिक डिग्री और मार्कशीट बरामद किए गए थे। इनमें बीटेक, एमटेक, बीफार्मा, डीफार्मा, एलएलबी जैसे पेशेवर पाठ्यक्रमों के दस्तावेज शामिल थे।
जांच में सामने आया है कि यह गिरोह वर्ष 2012 से सक्रिय था और व्यवस्थित तरीके से फर्जी डिग्री, माइग्रेशन सर्टिफिकेट और अंकपत्र तैयार कर रहा था। अब तक इस मामले में शैलेंद्र कुमार ओझा, नागेश मणि त्रिपाठी, जोगेंद्र, अश्वनी कुमार सिंह और विनीत को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है।
विशेष जांच टीम (एसआईटी) द्वारा जब श्रीकृष्णा यूनिवर्सिटी से संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन कराया गया, तो कई गंभीर गड़बड़ियां सामने आईं। बरामद दस्तावेजों में एमएसडब्ल्यू, बीए-बीएड, बीएससी, बीए, बीए-एलएलबी, बीसीए, बीकॉम, एमएससी, एमए, एलएलबी, पीजीडीसीए, एलएलएम, पॉलिटेक्निक डिप्लोमा और एमबीए की मार्कशीट व ग्रेडशीट शामिल थीं।
FutureCrime Summit 2026 Calls for Speakers From Government, Industry and Academia
सत्यापन के दौरान 67 दस्तावेज पूरी तरह फर्जी पाए गए, जिससे इस गिरोह के नेटवर्क की गहराई और व्यापकता का अंदाजा लगाया जा सकता है। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह सिर्फ एक हिस्सा है और आने वाले दिनों में और बड़े खुलासे हो सकते हैं।
मामले की जांच कर रही एसआईटी अब आरोपितों को रिमांड पर लेकर पूछताछ की तैयारी में है, ताकि इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान की जा सके। अधिकारियों का कहना है कि रिमांड के दौरान डिजिटल साक्ष्यों, बैंक खातों और संपर्क सूत्रों के आधार पर गिरोह के पूरे नेटवर्क को खंगाला जाएगा।
जांच के दौरान यह भी सामने आया है कि गिरोह के सरगना के बैंक खातों में करीब ₹12 करोड़ का लेनदेन हुआ है। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि यह अवैध कारोबार लंबे समय से बड़े पैमाने पर संचालित हो रहा था। साथ ही, गिरोह के एक सदस्य की लोकेशन बेंगलुरु में मिलने से यह संकेत मिलता है कि नेटवर्क देश के विभिन्न शहरों तक फैला हुआ था।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फर्जीवाड़े न केवल छात्रों के भविष्य को खतरे में डालते हैं, बल्कि शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करते हैं। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई और तकनीकी निगरानी की आवश्यकता है, ताकि इस तरह के गिरोहों पर पूरी तरह अंकुश लगाया जा सके।
फिलहाल, कानपुर में उजागर हुआ यह फर्जी डिग्री रैकेट देशभर के शैक्षणिक संस्थानों और अभ्यर्थियों के लिए चेतावनी बनकर सामने आया है। जांच एजेंसियां अब इस नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने के लिए लगातार कार्रवाई कर रही हैं।
