भोपाल। मध्य प्रदेश के गुना जिले में कथित कैश हेरफेर और रिश्वत के आरोपों से जुड़े मामले में बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई हुई है। गुना के पुलिस अधीक्षक रहे अंकित सोनी को उनके पद से हटा दिया गया है, जबकि इस मामले से जुड़े चार पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है। प्राथमिक जांच में सामने आई अनियमितताओं के आधार पर यह कदम उठाया गया है और पूरे प्रकरण की विस्तृत विभागीय जांच शुरू कर दी गई है।
मामले की शुरुआत एक SUV वाहन से हुई, जिसे गुजरात से आए एक कारोबारी द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा था। आरोप है कि वाहन को रोकने के बाद पुलिस टीम को उसमें करीब ₹1 लाख नकद राशि मिली थी। हालांकि, आरोप यह है कि मामले को आगे बढ़ाने के बजाय पुलिसकर्मियों ने वाहन और नकदी को छोड़ दिया और कथित तौर पर ₹20 लाख की रिश्वत लेकर मामले को ‘सेटल’ कर दिया।
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जांच में यह भी सामने आया कि वाहन को पहले रूठियाई पुलिस चौकी ले जाया गया था, लेकिन वहां से बिना किसी आधिकारिक कार्रवाई के छोड़ दिया गया। इस पूरी प्रक्रिया में न तो आयकर विभाग को सूचना दी गई और न ही वरिष्ठ अधिकारियों को अवगत कराया गया, जो कि नियमों के खिलाफ माना जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, गुजरात के संबंधित कारोबारी ने बाद में इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी अपने राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी को दी, जिसके जरिए मामला मध्य प्रदेश के उच्च स्तर तक पहुंचा। इसके बाद तत्काल संज्ञान लेते हुए प्राथमिक जांच कराई गई, जिसमें संबंधित पुलिसकर्मियों के आचरण को संदिग्ध और नियमों के विपरीत पाया गया।
प्राथमिक जांच के बाद चार पुलिसकर्मियों—थाना प्रभारी, चौकी प्रभारी, एक हेड कॉन्स्टेबल और एक चालक—को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। इनके खिलाफ अब विस्तृत विभागीय जांच की जा रही है, जिसमें पूरे घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ा जाएगा और यह पता लगाया जाएगा कि किस स्तर पर नियमों की अनदेखी की गई।
इस मामले में एक अहम पहलू यह भी रहा कि जिले के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक पर आरोप है कि उन्होंने न केवल संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ समय रहते कार्रवाई नहीं की, बल्कि पूरे मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक भी नहीं पहुंचाई। इसी आधार पर उनके आचरण को ‘अनुचित’ मानते हुए उन्हें पद से हटाया गया और मुख्यालय में नई जिम्मेदारी दी गई है।
राज्य स्तर पर इस मामले को गंभीरता से लिया गया है और अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से की जाए। यदि जांच में आरोपों की पुष्टि होती है, तो संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।
सूत्रों का कहना है कि यदि गुजरात के कारोबारी द्वारा औपचारिक शिकायत दर्ज कराई जाती है, तो यह मामला आपराधिक केस में भी बदल सकता है। ऐसे में रिश्वत, कदाचार और आपराधिक विश्वासघात जैसे आरोपों के तहत मामला दर्ज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है।
यह घटना राज्य में पहले सामने आ चुके एक समान मामले की याद भी दिलाती है, जिसमें कथित रूप से बरामद नकदी में हेरफेर के आरोप में कई पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की गई थी। ऐसे मामलों से पुलिस व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े होते रहे हैं।
फिलहाल, जांच एजेंसियां इस मामले के सभी पहलुओं की गहराई से जांच कर रही हैं। आने वाले समय में और खुलासे हो सकते हैं, जिससे यह स्पष्ट होगा कि पूरे घटनाक्रम में किसकी क्या भूमिका रही।
कुल मिलाकर, यह मामला कानून व्यवस्था तंत्र के भीतर जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक अहम परीक्षा बन गया है। निष्पक्ष जांच और ठोस कार्रवाई ही इस तरह के मामलों में जनता का भरोसा बहाल कर सकती है।
