अहमदाबाद। गुजरात में ट्रस्ट फंड से जुड़ी एक बड़ी वित्तीय अनियमितता के मामले में जांच ने अहम मोड़ ले लिया है। ₹6.85 करोड़ की कथित धोखाधड़ी के आरोप में एक चार्टर्ड अकाउंटेंट तेहमुल सेठना के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत विशेष अदालत में अभियोजन शिकायत दाखिल की गई है। मामला ट्रस्ट के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों के दुरुपयोग से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसमें फर्जी दस्तावेजों और हस्ताक्षरों के जरिए रकम निकाले जाने के आरोप सामने आए हैं।
जांच के अनुसार, यह मामला एनवायरनमेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर (ERDC) नामक ट्रस्ट से जुड़ा है, जहां आरोपी को ट्रस्ट के वित्तीय और प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसी दौरान उसने कथित तौर पर ट्रस्टी के हस्ताक्षर हासिल कर एक बैंक खाता खुलवाया और बाद में उन्हीं हस्ताक्षरों का दुरुपयोग करते हुए फर्जी तरीके से बेयरर चेक जारी कर दिए।
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आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया, ताकि ट्रस्ट के अन्य ट्रस्टियों को इसकी भनक तक न लगे। जांच में यह सामने आया है कि आरोपी ने बिना किसी अधिकृत अनुमति के ट्रस्ट के खाते से लगातार धन निकासी की और इस तरह करीब ₹6.85 करोड़ की राशि निकाल ली। यह पूरी रकम कथित तौर पर ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ के रूप में दर्ज की गई है।
मामले की शुरुआत उस समय हुई जब इस धोखाधड़ी को लेकर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। चूंकि यह अपराध PMLA के तहत निर्धारित अपराधों की श्रेणी में आता है, इसलिए प्रवर्तन एजेंसी ने भी इस मामले में अलग से जांच शुरू की और अब विशेष अदालत में अभियोजन शिकायत दाखिल की है।
जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर पहले ही एक अस्थायी कुर्की आदेश जारी किया जा चुका है। इसके तहत आरोपी से जुड़ी कई अचल संपत्तियों—जिनमें फ्लैट और प्लॉट शामिल हैं—को अटैच किया गया है। इन संपत्तियों का कुल मूल्य भी लगभग ₹6.85 करोड़ बताया जा रहा है, जो कथित तौर पर धोखाधड़ी से अर्जित राशि के बराबर है।
इस पूरे प्रकरण में जांच एजेंसियों का मानना है कि ट्रस्ट के भीतर वित्तीय निगरानी की कमी और एक ही व्यक्ति को व्यापक अधिकार दिए जाने का फायदा उठाकर इस घोटाले को अंजाम दिया गया। ट्रस्ट जैसे संस्थानों में पारदर्शिता और मल्टी-लेयर ऑडिट सिस्टम की अनुपस्थिति ऐसे मामलों को जन्म देती है, जहां एक व्यक्ति पूरे सिस्टम का दुरुपयोग कर सकता है।
वित्तीय मामलों के जानकारों का कहना है कि इस तरह के मामलों में दस्तावेजों की नियमित जांच और ट्रांजैक्शन की स्वतंत्र निगरानी बेहद जरूरी है। विशेष रूप से जब किसी व्यक्ति को वित्तीय निर्णय लेने का अधिकार दिया जाता है, तो उसके कार्यों पर समय-समय पर समीक्षा होना आवश्यक है।
मामला फिलहाल अहमदाबाद की विशेष अदालत में लंबित है, जहां आगे की सुनवाई में जांच एजेंसियां अपने साक्ष्य प्रस्तुत करेंगी। यदि आरोप साबित होते हैं, तो आरोपी के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की संभावना है।
यह मामला एक बार फिर यह संकेत देता है कि ट्रस्ट और गैर-लाभकारी संस्थानों में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना कितना आवश्यक है। अन्यथा, इसी तरह के मामलों में सार्वजनिक और दान की गई राशि का दुरुपयोग होना आसान हो जाता है, जिससे न केवल आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि संस्थानों की विश्वसनीयता पर भी गंभीर असर पड़ता है।
