चंडीगढ़। IDFC फर्स्ट बैंक से जुड़े बहुचर्चित वित्तीय घोटाले में जांच ने रफ्तार पकड़ ली है। करीब ₹200 करोड़ की कथित धोखाधड़ी के मामले में तीन पूर्व बैंक कर्मचारियों—रिभव ऋषि, अभय कुमार और सीमा धीमान—को स्थानीय अदालत ने 7 दिन की रिमांड पर भेज दिया है। जांच एजेंसियां अब इन आरोपियों से गहन पूछताछ कर पूरे मनी ट्रेल को खंगालने में जुट गई हैं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सरकारी खातों से धन कैसे और किन माध्यमों से siphon किया गया।
मामला चंडीगढ़ नगर निगम और चंडीगढ़ रिन्यूएबल एनर्जी एंड साइंस एंड टेक्नोलॉजी प्रमोशन सोसाइटी (CREST) के खातों से जुड़ा है, जहां बड़े पैमाने पर संदिग्ध लेनदेन सामने आए हैं। शुरुआती जांच में ₹116 करोड़ से अधिक की गड़बड़ी और करीब ₹75 करोड़ के संदिग्ध ट्रांजैक्शन का पता चला है। यह मामला तब और गंभीर हो गया जब इसकी कड़ियां हरियाणा में सामने आए ₹590 करोड़ के बड़े घोटाले से जुड़ती दिखाई दीं।
जांच के मुताबिक, इस पूरे फर्जीवाड़े की शुरुआत फरवरी में हुई थी, जब रिभव ऋषि और अभय कुमार की गिरफ्तारी के बाद कई अहम खुलासे सामने आए। आरोप है कि बैंक के अंदरूनी सिस्टम और प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर सरकारी खातों में जमा रकम को योजनाबद्ध तरीके से डायवर्ट किया गया। इस नेटवर्क में बैंक के पूर्व कर्मचारियों की भूमिका को लेकर जांच एजेंसियां विशेष रूप से सतर्क हैं।
अदालत में पेशी के दौरान जांच पक्ष ने आरोपियों की 10 दिन की रिमांड की मांग की थी, यह कहते हुए कि उन्हें अन्य सह-आरोपियों और संदिग्धों के साथ आमने-सामने बैठाकर पूछताछ करनी है। हालांकि अदालत ने फिलहाल 7 दिन की रिमांड मंजूर की है। इस दौरान आरोपियों से उन बैंक खातों, लेनदेन के पैटर्न और संभावित लाभार्थियों के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाई जाएगी, जिनके जरिए यह धन इधर-उधर किया गया।
जांच में एक अन्य नाम विक्रम वाधवा का भी सामने आया है, जिसे पहले ही रिमांड पर लिया जा चुका है। आरोप है कि उसने सरकारी धन को रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में निवेश करने की बात स्वीकार की है। सूत्रों के मुताबिक, वाधवा ने IDFC बैंक में खाते खोलने और निवेश की रणनीति बनाने में अहम भूमिका निभाई, जिसमें रिभव ऋषि की सलाह भी शामिल थी। बाद में ऋषि बैंक की एक शाखा में मैनेजर के पद पर पहुंच गया, जिससे उसे सिस्टम तक बेहतर पहुंच मिल गई।
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जांच एजेंसियों का मानना है कि यह मामला केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें एक बड़ा नेटवर्क सक्रिय हो सकता है, जिसमें बैंकिंग सिस्टम, निजी निवेश और बाहरी एजेंसियों के बीच मिलीभगत की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी कारण जांच का फोकस अब केवल आरोपियों तक सीमित न रहकर पूरे इकोसिस्टम पर केंद्रित किया जा रहा है।
इस मामले में पहले ही हरियाणा की एक जांच एजेंसी द्वारा 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें ये तीनों आरोपी भी शामिल हैं। चंडीगढ़ में दर्ज अलग-अलग मामलों के आधार पर अब इनसे दोबारा पूछताछ की जा रही है, ताकि दोनों राज्यों में दर्ज मामलों के बीच संबंधों को स्पष्ट किया जा सके।
वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के घोटाले बैंकिंग प्रणाली में मौजूद खामियों और निगरानी की कमी को उजागर करते हैं। खासकर जब सरकारी संस्थानों के खातों से जुड़े लेनदेन में इस तरह की गड़बड़ियां सामने आती हैं, तो यह न केवल आर्थिक नुकसान का कारण बनती हैं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास को भी प्रभावित करती हैं।
फिलहाल जांच जारी है और आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है। जांच एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे इस जटिल वित्तीय नेटवर्क की परतें खोलकर यह सुनिश्चित करें कि इसमें शामिल सभी जिम्मेदार लोगों तक कानून की पहुंच हो सके।
